मेरे हमदम को मुझसे बस इतनी शिकायत है ...
जवानी की दहलीज़ पे भी बचपन क्यों मुझसे जुदा नहीं होता...
मेरा हमनशीं मुझसे बस इस बात पे खफा है...
मेरी जुबान पे जो भी आता है उसमें सलीका नहीं होता...
मेरा हमसफ़र बस इस बात पे मुझसे नाराज है...
में उसके साथ चलती हूँ पर मेरा साया साथ नहीं होता...
मेरा हमराही बस इतनी सी बात पे रूठा है...
मुझे साल के कुछ ख़ास दिनों का क्यों ख्याल नहीं रहता...
पर किस तरह उसको बताऊँ ?
किस तरह अपनी जिंदगी को समझाऊं ?
ज़माने के दिए सारे गम उसके भुलाने को ...
मेरे भीतर का बचपन मुझसे अब भी जुदा नहीं होता...
मुझे दिल की बात कहने में सुकून मिलता है...
तो जुबान से निकली बात में मेरे कोई सलीका नहीं होता...
मेरा साया उसपे पड़ने वाली बालाओं को लेता है...
तो जब में चलती हूँ तो वहां मेरा साया साथ नहीं होता...
जिसे पल पल की फ़िक्र रखनी हो अपने हमदम की...
उसे साल क्या दिन क्या किसी भी बात का ख्याल नहीं रहता...
पर काश !!! वो इसे समझे...
मेरे खाब-ओ-ख्याल को समझे...
मेरे अनकहे जज्बात को समझे...
जैसी भी हूँ में उसके लिए हूँ ...
उसकी दुनिया उसकी जिंदगी हूँ ...
उससे जुदा हो कर में कहाँ कुछ हूँ...
पर काश !!! वो इसे समझे...
भावार्थ...
एहसासों के कारवां कुछ अल्फाजो पे सिमेटने चला हूँ। हर दर्द, हर खुशी, हर खाब को कुछ हर्फ़ में बदलने चला हूँ। न जाने कौन सी हसरत है इस मुन्तजिर भावार्थ को।अनकहे अनगिनत अरमानो को अपनी कलम से लिखने चला हूँ.....
Friday, December 26, 2008
उसे मुझे से शिकायत है !!!
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