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Saturday, February 18, 2012

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...
याद रह जाएगी ये  रात करीब आ जाओ...

एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की...
आज बसमें नहीं जज्बात करीब आ जाओ...

सर्द झोंको से भड़कते हैं बदन में शोले...
जान ले लेगी ये बरसात करीब आ जाओ...

इस कदर हमसे झिझकने के जरूरत क्या है....
जिंदगी भर का है अब साथ करीब आ जाओ...

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...

याद रह जाएगी ये रात करीब आ जाओ...

साहिर लुधियानवी...





Thursday, December 8, 2011

तुम मुझे भूल भी जाओ तो हक है तुमको...

तुम मुझे  भूल भी जाओ तो हक है तुमको...
मेरी बात कुछ और है मैंने तो मोहब्बत की है...

मेरे दिल की मेरे जज्बात की कीमत क्या है..
इंज उलझे उलझे ख्यालात की कीमत क्या है...
मैंने क्यों प्यार किया तुमने क्यों प्यार किया..
इन परेशान सवालात की कीमत क्या है...

तुम मुझे इतना भी न बताओ तो ये हक है तुमको...
मेरी बात कुछ और है मैंने तो मोहब्बत की है...


तुम मुझे भूल भी जाओ तो हक है तुमको...

मेरी बात कुछ और है मैंने तो मोहब्बत की है...
जिंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है...
जुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है...
भूख और प्यास की मरी इस दुनिया में..
इश्क ही इक हकीकत नहीं कुछ और भी है..

तुंम आँख चुराओ तो ये हक है तुमको...
मैंने तुमसे ही नहीं सबसे मोहब्बत की है...

तुमको दुनिया के दर्द-ओ- गम से फुर्सत न सही...
सबसे उल्फत सही मुझसे ही मोहब्बत न सही ...
में तुम्हारी हूँ यही मेरे लिए  क्या कम है..
तुम मेरे हो मकर  रहो ये मेरी किसमत ना सही..
और दिल को जलाओ ये हक है तुमको..
मेरी बात कुछ और है मैंने तो मोहब्बत की है...

तुम मुझे भूल भी जाओ तो हक है तुमको...

मेरी बात कुछ और है मैंने तो मोहब्बत की है...

साहिर लुधियानवी !!!

Saturday, August 29, 2009

आज इस दर्जा पिला दो के न कुछ याद रहे !!!

आज इस दर्जा पिला दो के न कुछ याद रहे...
बेखुदी इतनी बढ़ा दो के न कुछ याद रहे...
आज इस दर्जा पिला दो के न कुछ याद रहे ...

दोस्ती क्या है, वफ़ा क्या है मुहब्बत क्या है...
दिल का क्या मोल है एहसास की कीमत क्या है...
हमने सब जान लिया है के हकीकत क्या है...
आज बस इतनी दुआ दो के न कुछ याद रहे...
आज इस दर्जा पिला दो के न कुछ याद रहे ...

मुफलिसी देखी, अमीरी की अदा देख चुके...
गम का माहौल, मसर्रत की खिजा देख चुके...
कैसे फिरती है ज़माने की हवा देख चुके...
शम्मा यादों की बुझा दो, के न कुछ याद रहे...
आज इस दर्जा पिला दो के न कुछ याद रहे...

इश्क बेचैन खयालो के सिवा के कुछ भी नही...
हुस्न बेरूह उजालों के सिवा कुछ भी नही...
जिंदगी चाँद सवालों के सिवा कुछ भी नही ...
हर सवाल ऐसे मिटा दो के न कुछ याद रहे ...
आज इस दर्जा पिला दो के न कुछ याद रहे ...

मिट न पायेगा जहाँ से कभी नफ़रत का रिवाज...
हो न पायेगा कभी रूह के ज़क्मों का इलाज...
सल्तनत ज़ुल्म, खुदा वहम मुसीबत है समाज...
ज़हन को ऐसे सुला दो के न कुछ याद रहे...
आज इस दर्जा पिला दो के न कुछ याद रहे...

बेखुदी इतनी बढ़ा दो के न कुछ याद रहे...
आज इस दर्जा पिला दो के न कुछ याद रहे...

साहिर लुधियानवी...

Monday, June 8, 2009

अपनी दुनिया !!! साहिर लुधियानवी...

अपनी दुनिया पे सदियों से छायी हुई संगदिल रात है।
यह न समझो की ये आज की बात है।
जब से दुनिया बनी जब से धरती बसी।
हम युही ज़िन्दगी को तरसते रहे।
मौत की आंधियां घिर के छाती रहीं।
आग और खून के बादल बरसते रहे।
तुम भी मजबूर हो हम भी मजबूर हैं।
क्या करें यह बुजुर्गो की सौगात है।

हम
अंधेरे की गुफाओं से निकले मगर।
रौशनी अपनी सीनों से फूटती नहीं।
हमने जंगल सहरो में बदले मगर।
जंगल की तहजीब हमसे छूटती नहीं।

अपनी
बदनाम इंसानियत की कसम।
अपनी हैवानिउयत आज तक एक साथ है।
हमने सुकरात को जेहर की भेट दी।
और ईसा को सूली का तोहफा दिया।
हमने गाँधी के सीने को चलनी किया।
केनेडी को जावा खून से नहला दिया।

साहिर लुधियानवी...

Sunday, February 15, 2009

तंग आ चुके हैं हम...!!!

तंग आ चुके कश्मकशे जिंदगी से हम...
ठुकरा न दे जहाँ को कहीं बेरुखी से हम...

हम गमजदा हैं लाये कहाँ से खुशी के गीत....
देंगे वही जो पायेंगे इस जिंदगी से हम...

उभरेंगे एक बार अभी दिल के वलवाले...
माना की दब गए हैं गम-ऐ-जिंदगी से हम...

लो आज हमने आज तोड़ दिया रिश्ता-ऐ-उम्मीद....
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम...

साहिर लुधियानवी..

Thursday, January 8, 2009

संसार है एक नदिया !!!

संसार है एक नदिया दुःख सुख दो किनारे हैं...
न जाने कहाँ जाएँ हम बहते धारे हैं...

चलते हुए जीवन की रफ़्तार में एक लय है...
एक राग में एक सुर में संसार की हर शय है...

एक ताल की गर्दिश पे ये चाँद सितारे हैं...
न जाने कहाँ जाएँ हम बहते धारे हैं...

धरती पे अमबर की आंखों से बरसती है...
इक रोज यही बूंदे फ़िर बादल बनती है...

इस बनने बिगड़ने के दस्तूर में सारे हैं...
न जाने कहाँ जाएँ हम बहते धारे हैं...

कोई भी किसी के लिए अपना न पराया है...
रिश्तो के उजाले में हर आदमी साया है...

कुदरत के भी देखो ये खेल निराले हैं...
न जाने कहाँ जाएँ हम बहते धारे हैं...

है कौन वो दुनिया में ना पाप किया जिसने ...
बिन उलझे कांटो से हैं फूल चुने जिसने...

बेदाग़ नहीं कोई यहाँ पापी सारे हैं...
न जाने कहाँ जाएँ हम बहते धारे हैं...

साहिर लुधियानवी..

Monday, January 5, 2009

ये पर्बतों के दायरे !!!

ये पर्बतों के दायरे ये शाम का धुंआ...
ऐसे में क्यों न छेड़ दें दिलों की दास्ताँ...
ज़रा सी जुल्फ खोल दो फिजा में इत्र घोल दो...
नज़र जो बात कह चुकी वो बात मुंह से बोल दो...
की झूम उठे निगाह में बहार का समां...
ये पर्बतों के दायरे ...ये शाम का धुंआ...

ये चुप भी एक सवाल है अजीब दिल का हाल है ...
हर इक ख़याल खो गया बस अब यही ख़याल है...
की फासला न कुछ रहे हमारे दरमियान...
ये पर्बतों के दायरे ... ये शाम का धुंआ...

ये रूप रंग ये फबन चमकते चाँद सा बदन...
बुरा न मानो तुम अगर तो चूम लूँ किरण...
किरण की आज हौसलों में है बाला की गर्मियां ...
ये पर्बतों के दायरे...ये शाम का धुंआ...

साहिर लुधियानवी...

Thursday, January 1, 2009

इतनी नाज़ुक न बनो !!!

इतनी नाज़ुक न बनो, हाय, इतनी नाज़ुक न बनो...
हद के अन्दर हो नजाकत, तो अदा होती है...
हद से बड़ा जाए थो, आप अपनी सज़ा होती है...

इतनी
नाज़ुक न बनो, हाय, इतनी नाज़ुक न बनो...

जिस्म का बोझ उठाए नहीं, उठा थम से...
जिंदगानी का कडा बोझ, सहोगी कैसे...
थम जो हलकी सी, हवावों में लचक जाती हो...
तेज़ झोंकों के थपेडों, में रहोगी कैसे...

इतनी
नाज़ुक न बनो, हाय, इतनी नाज़ुक न बनो..

यह न समझो के हर इक राह में कलियाँ होंगी...
राह चलनी है तो काँटों से भी चलना होगा...
यह नया दौर है, इस दौर में जीने के लिए...
हुस्न को हुस्न का, अंदाज़ बदलना होगा,

इतनी
नाज़ुक न बनो, हाय, इतनी नाज़ुक न बनो॥

कोई
रुकता नहीं, ठहरे हुए राही के लिए..
जो भी देखेगा, वोह कतराके गुज़र जायेगा...
हम अगर वक्त के, हमराह न चलने पाये...
वक्त हम दोनों को, ठुकराके गुज़र जायेगा...

इतनी
नाज़ुक न बनो, हाय, इतनी नाज़ुक न बनो...

इतनी नाज़ुक न बनो, हाय, इतनी नाज़ुक न बनो...
हद के अन्दर हो नजाकत, थो अदा होती है...
हद से बड़ा जाए थो, आप अपनी सज़ा होती है
इतनी नाज़ुक न बनो, हाय, इतनी नाज़ुक न बनो...

साहिर लुधियानवी...

Monday, December 22, 2008

मुहब्बत तर्क की मैंने !!!

मुहब्बत तर्क की मैंने गरेबान सी लिया मैंने...
ज़माने अब तो खुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने...

अभी जिंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ खल्वत में...
की अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने...

उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है...
कोई कुछ मुद्दत हसीं खाबो में खो कर जी लिया मैंने...

बस अब तो दामन-ऐ-दिल छोड दो बेकार उम्मीदों
बहुत सीख सह लिया मैं ने बहुत दिन जी लिया मैंने...

साहिर लुधियानवी...

Wednesday, December 17, 2008

जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं !!!

जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ...
में तो मर के मेरी जान तुझे चाहूंगा...

तू मिला है तो ये एहसास हुआ ही मुझको...
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोडी है...
एक जरा सा गम-ऐ-दौरा है जिसपे हक है ...
मैंने वोह साँस भी तेरी लिए रख छोडी है...

तुझपे
हो जाऊँगा कुर्बान तुझे चाहूंगा...
में तो मर के भी मेरी जान तुझे चाहूंगा...

अपने जज्बात में नगमात रचाने के लिए...
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे...
में तस्सवुर भी जुदाई का कैसे करू..
मैंने किस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे...

प्यार का निगहबान बनके तुझे चाहूंगा...
में तो मर के भी मेरी जान तुझे चाहूँगा ...

साहिर लुधियानवी...






Wednesday, December 3, 2008

जो ग़म से हार जाओगे,..!!!

दुःख और सुख के रास्ते, बने हैं सब के वास्ते ...
जो ग़म से हार जाओगे, तो किस तरह निभाओगे...
खुशी मिले हमें के ग़म, जो होगा बाँट लेंगे...
हम्मुझे तुम आजमाओ तो ज़रा नज़र मिलाओ तो...

ये जिस्म दूर हैं मगर, दिलों में फासला नहीं...
जहाँ में ऐसा कौन है, कोई जिसको ग़म मिला नहीं...

तुम्हारे प्यार कि क़सम, तुम्हारा ग़म है मेरा ग़म...
न यूं बुझे बुझे रहो, जो दिल कि बात है कहो...
जो मुझे से भी छुपाओगे, तो फिर किसे बताओगे ...
मैं कोई गैर तो नहीं, दिलाऊं किस तरह यकीन...
कोई तुमसे मैं जुदा नहीं, मुझे से तुम जुदा नहीं...

साहिर लुधियानवी...

Monday, December 1, 2008

मेरी नाकाम मुहब्बत की कहानी मत छेड...

मेरी नाकाम मुहब्बत की कहानी मत छेड...
अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सुना
जिंदगी तल्ख़ सही, ज़हर सही, सम ही सही...
दर्द-ओ-आजार सही , जब्र सही , ग़म ही सही...
लेकिन इस दर्द-ओ-ग़म-ओ-जब्र की वुसत को तो देख...
ज़ुल्म की छाँव में दम तोरती खल्कात को तो देख...
अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सूना...
मेरी नाकाम मुहब्बत की कहानी मत छेड...
जलसा-गाहों में ये वहशत-ज़दः सहमे अन्बोह...
रहगुज़ारों पे फलाकत ज़दः लोगों के गिरोह...
भूखे और प्यास से पाज़-मुर्दः सियाह-फाम ज़मीन...
तीरह-ओ-तार मकान, मुफलिस-ओ-बीमार मकीन ...
नौ’ऐ-इंसान में ये सरमाया-ओ-मेहनत का ताजाद...
अमन-ओ-तहजीब के परचम टेल कौमों का फसाद...
हर तरफ़ आतिश-ओ-आहन का ये सैलाब-ऐ-अजीम...
नित नए तर्ज़ पे होती हुई दुनिया तकसीम...
लहलहाते हुए खेतों पे जवानी का समान ...
और दहकान के छप्पर में न बत्ती न धुंआ...
ये फलक-बोस मिलें, दिलकश-ओ-सीमीं बाज़ार...
ये घलाज़त ये झपट_ते हुए भूखे बाज़ार...
दूर साहिल पे वो शफ्फाफ मकानों की कतार...
सरसराते हुए परदों में सिमट_ते गुलज़ार...
डर-ओ-दीवार पे अनवार का सैलाब रवां...
जैसे इक शायर-ऐ-मदहोश के ख़्वाबों का जहाँ...
ये सभी क्यों है ये क्या है, मुझे कुछ सोचने दे...
कौन इंसान का खुदा है, मुझे कुछ सोचने दे ...
अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सूना ...
मेरी नाकाम मुहब्बत की कहानी मत छेर...

साहिर लुधियानवी...

Sunday, November 30, 2008

मैं ने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिखे... !!!

मैं ने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिखे...
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ...

आज
दूकान पे नीलाम उठेगा उनका...
तू ने जिन गीतों पे रखी थी मुहब्बत कि असास...
आज चांदी के तराजू में तुलेगी हर चीज़...
मेरे अफकार, मेरी शायरी मेरा अहसास...

जो
तेरी जात से मंसूब थे उन गीतों को...
मुफलिसी जींस बना ने पे उतर आयी है...
भूक तेरे रुख-ऐ-रंगीन के फसानों के...
‘एवाज्चंद अश’ये-ऐ-ज़रूरत की तमन्नाई है...

देख
इस ‘अर्सागाह-ऐ-महनत-ओ-सरमाया में...
मेरे नग्मे भी मिरे पास नहीं रह सकते...
तेरे जलवे किसी ज़रदार कि मीरास सही...
तेरे खाके भी मेरे पास नहीं रह सकते...

आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया होऊं ...
मैं ने जो गीत तेरे प्यार कि खातिर लिक्खे...

साहिर लुधियानवी...

Sunday, November 23, 2008

जिन्हें नाज़ है हिंद पे...

ये कूचे ये नीलम घर दिलकशी के...
ये लुटते हुए कारवाँ ज़िन्दगी के...
कहाँ हैं कहाँ है मुह्जिस खुदी के..
जिन्हें नाज़ है हिंद पे...
वो कहाँ हैं कहाँ है कहाँ है ...

ये पुरपेच गलियां ये बदनाम बाज़ार...
ये गुमनाम राही ये सिक्को की झंकार...
ये इस्मत के सौदे ये सौदों पे तकरार....
जिन्हें नाज़ है हिंद पे...
वो कहाँ हैं वो कहाँ है कहाँ है ...

ये सदियों से बेखौफ सहमी सी गलियां...
ये मसली हुई अद्खिली जर कलियन...
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ ...
जिनको नाज़ है हिंद पे...
वो कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं ?

वोह ujale दरीचो में पायल की चन चन..
थकी हारी साँसों पे तब्लो की ठन ठन ...
ये बेरूह कमरों में खांसी की आवाज़...
जिहें नाज़ है हिंद पे वो...
कहाँ है कहाँ है कहाँ है...

ये फूलो की गजरे वो पीको के छींटे...
ये बेबाक नज़ारे ये गुस्ताख फितर...
ये ठलके बदन और बीमार चहेरे
जिन्हें नाज़ हैं हिंद पे वो...
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ है...

यहाँ पीर भी आ चुके और जवान भी...
नौ मंद बेटे और अब्बा मियां भी...
य बीवी है बेटी है और माँ bhii...
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो...
कहाँ है कहाँ है कहाँ है ...

मदद चाहती है ये हवा की बेटी॥
यशोदा की हमजिंस राधा की बेटी...
पागाम्बर की उम्मत जुलेह्खन की बेटी.
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो...
कहाँ है कहाँ है कहाँ है...

जरा मुल्क के रहबरों को बुलाओ॥
ये कूचे ,यह गलियां ये मंजर दिखाओ...
जिन्हें नाज़ है हिंद उनको लाओ...
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो...
कहाँ है कहाँ है कहाँ हैं...


साहिर लुधियानवी...

Saturday, November 22, 2008

ठुकरा के पी गया...

गम इसकदर बढे की में घबरा के पी गया...
इस दिल की बेबसी पे घबरा के पी गया...

ठुकरा रहा था मुझे बड़ी बेरुखी से जहाँ...
में आज सब जहाँ को ठुकरा के पी गया...

ये हँसते हुए फूल ये महका हुआ गुलशन...
ये रंग में और ये नूर में डूबी हुई राहें...

ये फूलो का रस पिके मचलते हुए भंवरे...
में दू भी तो दू भी क्या तुम्हे शोख नज़रो...

ले दे कर मेरे पास कुछ आँसू हैं कुछ आहें हैं...

साहिर लुधियानवी...

Sunday, November 16, 2008

जो बात तुझमें है !!!

जो बात तुझ में है,
तेरी तसवीर में नही
तसवीर में नही...

रंगों में तेरा अक्स ढला, तू ना ढल सकी
साँसों की आंच जिस्म की खुशबू ना ढल सकी
तुझ में जो लोच है, मेरी तहरीर में नही
तहरीर में नही
जो बात तुझ में है,
तेरी तसवीर में नही

बेजान हुस्न में कहाँ, रफ़्तार की अदा
इनकार की अदा है, ना इकरार की अदा
कोई लचक भी जुल्फ-ऐ-गिरहगीर में नही
गिरहगीर में नही
जो बात तुझ में है,
तेरी तसवीर में नही

दुनिया
में कोई चीज़ नहीं है तेरी तरह
फिर एक बार सामने आजा किसी तरह
क्या और एक झलक मेरी तक़दीर में नही
तक़दीर में नही
जो बात तुझ में है,
तेरी तसवीर में नही

साहिर लुधियानवी...

Saturday, November 15, 2008

किसका रास्ता देखे ए दिल ए सौदाई...
मीलों है खामोशी बरसों है तनहाई...
भूली दुनिया कभिकी तुझे भी मुझे भी...
फिर क्यों आँख भर आयी...
कोई भी साया नहीं राहों मैं...
कोई भी आएगा न बाहों मैं...
तेरे लिए मेरे लिए कोई नहीं रोनेवाला...
झूठा भी नाता नहीं चाहूं मैं...
तू ही क्यों डूबा रहे आहों मैं...
कोई किसी संग मरे ऐसा नहीं होनेवाला...
कोई नहीं जो यूँ ही जहाँ मैं बातें पीर परायी...
किसका रास्ता देखे ए दिल ए सौदाई...
तुझे क्या बीती हुई रातों से...
मुझे क्या खोई हुई बातों से...
सेज नहीं चिता सही जो भी मिले सोना होगा...
गई जो डोरी छूती हाथों से...
लेना क्या टूटे हुए सातों से...
खुशी जहाँ मांगी तूने वहीँ मुझे रोना होगा...
न कोई तेरा न कोई मेरा फिर किसकी याद आई...
किसका रास्ता देखे ए दिल ए सौदाई...

साहिर लुधियानवी...

Friday, November 14, 2008

मन रे तू कहे न धीर धरे !!!

मन रे तू काहे न धीर धरे
ओ निर्मोही मोह न जाने जिनका मोह करे
मन रे तू काहे न धीर धरे

इस
जीवन की चढ़ती ढलती
धुप को किस ने बाँधा
रंग पे किस ने पहरे डाले
रूप को किस ने बाँधा
काहे यह जातां करे
मन रे तू काहे न धीर धरे

उतना
ही उपकार समझ कोई
जितना साथ निभा दे
जनम मरण का मेल है सपना
यह सपना बिसरा दे
कोई न संग मरे
मन रे तू काहे न धीर धरे

निर्मोही मोह न जाने जिनका मोह करे
हो मन रे तू काहे न धीर धरे

साहिर लुधियानवी...

Thursday, November 13, 2008

में हर एक पल का शायर हूँ !!! ( Original Poem )

में हर एक पल का शायर हूँ
हर एक पल मेरी कहानी है
हर एक पल मेरी हस्ती है
हर एक पल मेरी जवानी है
रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़तम नहीं होती
ख्वाबों की और उमंगो की, मियादें ख़तम नहीं होती
एक फूल में तेरा रूप बसा एक फूल में मेरी जवानी है
एक चेहरा तेरी निशानी है, एक चेहरा मेरी निशानी है
में हर एक पल का शायर हूँ...

तुझको
मुझको जीवन अमृत, अब इन हाथों से पीना है
इनकी धड़कन में बसना है, इनकी साँसों में जीना है
तू अपनी अदाएं बख्श इन्हें में अपनी वफाएं देता हूँ
जो अपने लिए सोची थी कभी, वोह सारी दुआएं देता हूँ
में हर एक पल का शायर हूँ...

साहिर लुधियानवी...

Wednesday, November 12, 2008

तेरा इश्क इश्क, इश्क इश्क...

न तो कारवां की तलाश है, न तो हमसफ़र की तलाश है...
मेरे शौक़-ऐ-खाना ख़राब को, तेरी रहगुज़र की तलाश है...
मेरे नामुराद जूनून का है इलाज कोई तो मौत है...
जो दावा के नाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है...

तेरा
इश्क है मेरी आरजू, तेरा इश्क है मेरी आबरू
दिल इश्क जिस्म इश्क है और जान इश्क है...
ईमान की जो पूछो तो ईमान इश्क है...
तेरा इश्क है मेरी आरजू, तेरा इश्क है मेरी आबरू...
तेरा इश्क में कैसे छोड़ दूँ, मेरी उम्र भर की तलाश है...

जानसोज़ की हालत को जानसोज़ ही समझेगा...
में शमा से कहता हूँ महफिल से नहीं कहता क्योंकि...
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है इश्क इश्क...

सहर तक सबका है अंजाम जल कर ख़ाक हो जाना...
भरी महफिल में कोई शम्मा या परवाना हो जाए क्योंकि...
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है इश्क इश्क...

वेह्शत
-ऐ-दिल रस्म-ओ-दीदार से रोकी न गई...
किसी खंजर, किसी तलवार से रोकी न गई...
इश्क मजनू की वो आवाज़ है जिसके आगे....
कोई लैला किसी दीवार से रोकी न गई, क्योंकि...
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है इश्क इश्क...

वो हंसके अगर मांगें तो हम जान भी देदें...
हाँ ये जान तो क्या चीज़ है ईमान भी देदें क्योंकि...
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है इश्क इश्क...

नाज़-ओ-अंदाज़ से कहते हैं की जीना होगा...
ज़हर भी देते हैं तो कहते हैं की पीना होगा...
जब में पीता हूँ तो कहतें है की मरता भी नहीं...
जब में मरता हूँ तो कहते हैं की जीना होगा....
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है इश्क इश्क...

मज़हब-ऐ-इश्क की हर रस्म कड़ी होती है...
हर कदम पर कोई दीवार खड़ी होती है...
इश्क आजाद है, हिंदू न मुसलमान है इश्क...
आप ही धर्म है और आप ही ईमान है इश्क...
जिस से आगाह नही शेख-ओ-बरहामन दोनों...

उस
हकीकत का गरजता हुआ ऐलान है इश्क...
इश्क न पूछे दीं धर्म नु, इश्क न पूछे जातां...
इश्क दे हाथों गरम लहू विच, डूबियाँ लाख बराताँ के
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है इश्क इश्क

राह
उल्फत की कठिन है इसे आसान न समझ..
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है इश्क इश्क...

बहुत कठिन है डगर पनघट की...
अब क्या भर लॉन में जमुना से मटकी...
में जो चली जल जमुना भरण को...
देखो सखी जी में जो चली जल जमुना भरण को...
नंदकिशोर मोहे रोके झाडों तो...
क्या भर लॉन में जमुना से मटकी...
अब लाज राखो मोरे घूंघट पट की...
जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सज के...
जान अजान का मान भुला के, लोक लाज को ताज के...
जनक दुलारी बन बन डोली, पहन के प्रेम की माला...
दर्शन जल की प्यासी मीरा पि गई विश् का प्याला...
और फिर अरज करी ...
लाज राखो राखो राखो, लाज राखो देखो देखो, ...
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है इश्क इश्क

अल्लाह रसूल का फरमान इश्क है...
याने हफीज इश्क है, कुरान इश्क है....
गौतम का और मसीह का अरमान इश्क है....
ये कायनात जिस्म है और जान इश्क है...
इश्क सरमद, इश्क ही मंसूर है....
इश्क मूसा, इश्क कोह-ऐ-नूर है...
खाक को बुत, और बुत को देवता करता है इश्क...
इंतहा ये है के बन्दे को खुदा करता है इश्क...
हाँ इश्क इश्क तेरा इश्क इश्क....
तेरा इश्क इश्क, इश्क इश्क...

साहिर लुधियानवी...