Showing posts with label कैफी आज़मी. Show all posts
Showing posts with label कैफी आज़मी. Show all posts

Monday, January 26, 2009

अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..

कर चले हम फ़िदा, जन-ओ-तन साथियों..
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..

कर चले हम फ़िदा, जन-ओ-तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों,
कर चले हम फ़िदा, जन-ओ-तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों,

साँस थम थी गई, नब्ज़ जम थो गई,
फिर भी बदठे कदम को न रुख ने दिया,
कट गए सर हमारे, थो कुछ गम नहीं,
सर हिमालय का हमने न झुक ने दिया,
मरते मरते रहा बांक पण साथियों,
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..

कर चले हम फ़िदा, जन-ओ-तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..

जिंदा रहेने के मौसम, बहुत है मगर,
जान देने की रुत रोज़ आती नहीं,
हुस्न और इश्क दोनों को रुसवा करे,
वोह जवानी जो खून में नाहाठी नहीं,
आज धरती बनी है दुल्हन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..

कर चले हम फ़िदा, जन-ओ-तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..

राह कुर्बानियों की न वीरान हो,
तुम सजाते ही रहना नए काफिले,
फाथे का जश्न इस जश्न के बाद हैं,
जिंदगी मौत से मिल रही है गले,
बन्द्लो अपने सर से कफ़न साथियों,

अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..
कर चले हम फ़िदा, जन-ओ-तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..

खेंच दो अपने खून से ज़मीन पर लकीर,
इस तरह आने ने पाये न रावन कोई,
थोड दो हाथ अगर हाथ उतने लगे,
चुने पाये न सीता का दामन कोई,
राम भी तुम, तुम्ही लक्ष्मण साथियों,

अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..
कर चले हम फ़िदा, जन-ओ-तन साथियों,

अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों..
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों॥

...कैफी आज़मी

Thursday, January 22, 2009

ख्वाईश !!!

वो भी सरहाने लगे अरबाब-ऐ-फन के बाद...
मुझे दाद-ऐ-सुखन मिली तर्क-ऐ-सुखन के बाद...

दीवाना वार चाँद से आगे निकला गए...
तेहरा नहीं दिल कहीं तेरे अंजुमन के बाद...


इंसान के खायिशो की कोई इन्तेआह नहीं...
दो गज जमीं भी चाहिए दो गज कफ़न के बाद...


होठो से सी के देखिये पछ्तायीयेगा आप...
फितने भी जाग उठते हैं अक्सर घुटन के बाद...


कैफी आज़मी...

Tuesday, January 6, 2009

शोर परिंदों ने यु ही न मचाया होगा...

शोर परिंदों ने यु ही न मचाया होगा...
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा...

पेड़ के कांटने वालो को ये मालूम तो था...
जिस्म जल जायंगे जब सर पे न साया होगा...

मानिए जश्न-ऐ-बहार ने ये सोचा भी नहीं...
किसने कांटो को लहू पाना पिलाया होगा...

अपने जंगल से घबरा के उडे थे जो प्यासे...
हर सेहरा उनको समंदर नज़र आया होगा...

बिजली के तार पे बैठा तनहा पंछी ....
सोचता है की यह जंगल तो पराया होगा...

शोर युही न परिंदों ने मचाया होगा...
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा...

कैफी आज़मी !!!

Sunday, October 12, 2008

कैफियत-६

जब भी चूम लेता हूँ इन हँसी आँखों को।
दिल में सौ चिराग झिलमिलाने लगते हैं।

फूल क्या सफूगे क्या चाँद क्या सितारे क्या।
सब रकीब कदमो पे सर झुकने लगते हैं।

रक्स करने लगती हैं मूरतें अजंता की।
मुद्दतो की लब-बसता गान गाने लगते हैं।

फूल खिलने लगते हैं उजडे उजडे गुलशन में।
प्यासी प्यासी धरती पे अम्ल चने लगते हैं।

लम्हों भर को ये दुनिया जुल्म छोड़ देती है।
लम्हों भर को सब पत्थर मुस्कुराने लगते हैं।

जब भी चूम लेता हूँ इन हसी आँखों को।
सौ चिराग अंधेरे में झिलमिलाने लगते हैं।

कैफी आज़मी...

Monday, August 18, 2008

अंदेशे...कैफी आज़मी

रूह बेचैन है इक दिल की अजीयत क्या है।
दिल ही शोला है तो शोज़-ऐ-मोहब्बत क्या है।
वोह मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है।
रंज तो यह है की रो रो कर भुलाया होगा।

वोह कहाँ और कहाँ खौफे-ऐ-गम सोजिश-ऐ-जान।
उसकी रंगीन नज़र और नक्स-ऐ-हिरमान।
उसका एहसास-ऐ-लतीफ़ और शिकस्त-ऐ-अरमान।
तानाज़न एक जमाना नज़र आया होगा।

झुक गई होगी जवाँ -साल उमंगो की जबी।
मिट गई होगी ललक मिट गया होगा यकीन।
छा गया होगा धुंआ घूम गई होगी जमीन।
अपने पहले ही घरोंदे को जो उसने ढाया होगा।

दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाये होंगे।
अश्क आखों ने पिए और न बहाए होंगे।
बंद कमरे में मेरे ख़त जो जलाये होंगे।
एक एक हर्फ़ जमीन पे उभर आया होगा।

उस ने घबराके नज़र लाख बचाई होगी।
मिटाके एक नक्श ने सौ शकल दिखाई होगी।
मेज से मेरी तस्वीर जब हटाई होगी।
हर तरफ़ मुझको तड़पता हुआ पाया बेम्हाल।

बेमहाल छेड़ पे जज्बात उबाल आये होंगे।
गम पशेमन तबस्सुम मैं ढल आये होंगे।
नाम पे मेरे जब आंसू निकल आये होंगे।
सर न सहेली के कांधे से उठाया होगा।

जुल्फ जिद करके किसी ने बांयी होगी।
रूठे जलवों पे खिजा और भी छायी होगी।
बर्क अशवो ने कई दिनों न गिराई होगी।
रंग चहरे पे कई दिन तक न आया होगा।

होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा।
जहर छुप करके दवा जान के खाया होगा।
वोह मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है।
रंज तो यह है की रो रो कर भुलाया होगा।

कैफी आज़मी...

अजियत: परेशानी
सोज़-इ-मोहब्बत: कंद ऑफ़ लव
हर्फ़ : शब्द
रंज: दर्द