Thursday, December 6, 2012

जिस्म की खायिश लिए जिस्म फिरते हैं

जिस्म की खायिश लिए जिस्म फिरते हैं
इक बदहवासी सी लिए होश फिरते हैं

ताल्लुकात जो न दुनिया को दिखाई दिए
अंगारे ऐसे ही लिए राख के गुबार फिरते हैं

सुहाग का सिदूर लाली कब की खो चूका
लत-ओ-नशा लिए यहाँ जिस्म फिरते हैं

तब्दील हम न हुए ये जमाना हुआ भाव
आरजू मौत की इश्क में हम लिए फिरते हैं

जिस्म की खायिश लिए जिस्म फिरते हैं
इक बदहवासी सी लिए होश फिरते हैं



भावार्थ









Tuesday, August 28, 2012

ये न पूछो उम्र कितनी है

ये न पूछो उम्र कितनी है
इस माटी के खिलोने की
गर पूछो तो चमक कितनी
इस भीतर बसे सोने की

बढ़ाना भी है तो तजुर्बा बढाओ
साल दर साल जश्न का मतलब क्या है
जिंदगी काम किसी के आ सके तो अच्छा ...
वरना झूठे लोगों में कहकहों का मतलब क्या है

अजीब राहगीर है हम भी दुनिया में
न राह का पता न मंजिल की खबर
मुद्दतों से जिससे है तड़पते रहे
उसी में अब भी डूबे आते हैं नज़र

एक और घडा भरेगा फूट जायेगा
न रहेगा घट का और पानी का निशाँ
जिन्दा था तू भी कभी इसी मिटटी पे
कुछ तो कर रह जाए उस करनी की निशा

भावार्थ













Thursday, August 23, 2012

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...
याद रह जायेगी ये बात करीब आ जाओ...

एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें चूने की ...
आज बस में नहीं जज्बात करीब आ जाओ...

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...

सर्द झोंक्जो से धड़कते हैं बदन में शोले..
जान ले लेगी ये बरसात करीब आ जाओ...

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...

इस कदर हमसे झिझकने की जरूरत क्या है..
जिंदगी भर का है अब साथ करीब आ जाओ...

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...

साहिर लुधियानवी...


 

Monday, August 20, 2012

इमली सी दुनिया लड्डू से खाब...

इमली सी दुनिया लड्डू से खाब...
अपने मोहल्ले के हम लाट साब...

इमली सी दुनिया लड्डू से खाब...

तन तनाकर हैं चलते ...
भन भनाकर है चलते  ...
खुद को समझते हम बेहिसाब...
अपने मोहल्ले के हम लाट साब...

इमली सी दुनिया लड्डू से खाब...

पापा की बक बक...
मम्मी की चक चक...
कौन रखे इन सब का हिसाब...
अपने मोहल्ले के हम लाट साब
इमली सी दुनिया लड्डू से खाब...

ये कौन है वो कौन है...
वो पूछते और हम मौन हैं ...
सच्चे सवालों के देते झूठे जवाब...
अपने मोहल्ले के हम लाट साब...

इमली सी दुनिया लड्डू से खाब...

भावार्थ...

Wednesday, August 15, 2012

सुनो गौर से है ये क्या कह रही...

हर एक रूह जो देश में रह रही..
सुनो गौर से है ये क्या कह रही...

रंग फीके हुए रंगीले फूलों के...
बहाव बूँद हुए बहती झीलों के...

हर एक नदी जो यहाँ पर बह रही...
सुनो गौर से है ये क्या कह रही...

जख्म खाए थे संग जिसे पाने को...
आमदा क्यों हैं हम उसे गवाने को...

रहे मुझसी सदा ये हवा कह रही...
सुनो गौर से है ये क्या कह रही...

बिखर जो गए टूट जायेंगे हम...
मिल कर चले दूर  जायेंगे हम...

हर कदम से कुछ देखो राह कह रही...
सुनो गौर से है ये क्या कह रही...

झाँक ले खुद ही के गरेबान में एक...
राम राज बने जो सुधर जाए हर एक...

एक एक सांस जो शख्श में बह रही...
सुनो गौर से है ये क्या कह रही...

हर एक रूह जो देश में रह रही..
सुनो गौर से है ये क्या कह रही...


Change is possible only when each individual changes. This independence Day is high time to introspect and to assess ourselves so that we can make efforts to make this country a better place to live. Independence is real gift from our freedom fighters who sacrificed their lives in every possible manner so that we can live in free world. Lets pledge to make India proud with our sincere efforts in every walk of our life.

Happy independence Day !!!

( In this poem "freedom/ independence/ aazaadi" wants to say something to its countrymen to make us realise something ,ets hear what it really wants to convery to all of Indians)

भावार्थ...



Saturday, August 11, 2012

उठते गिरते गिरते उठते तू जब सीखेगी चलना...

उठते गिरते गिरते उठते तू  जब सीखेगी चलना...
वो दिन  भी आएगा जब तू छोड़ के जायेगी अंगना...

तेरे खिलोने तेरी गुडिया तेरे रंग और तेरे साज...
तू जो गयी तो बाद तेरे  आते मुझे याद वो आज...

खुद से जुदा हूँ पौना तेरे बिन जो तू नहीं संगना...
वो दिन भी आएगा जब तू छोड़ के जायेगी अंगना...

हाथ हथेली साथ सहेली बन के रही तेरी माँ ...
तुझेसे जीती तुझपे मरती तुझ में बसी है उसकी जाँ ...

आंसू से फीकी हुई उसकी दुनिया कोई रहा रंगना...
वो दिन भी आएगा जब तू छोड़ के जायेगी अंगना...

हाथी घोडा भालू बन्दर तेरे लिए बने बने पापा तेरे ...
बस हस जाए एक पल को हो जाए फिर अरमा मेरे...

खुशियों के गुच्छे लगे हो तू जाए जिस भी अंगना...
वो दिन भी आएगा जब तू छोड़ के जायेगी अंगना...

भावार्थ ...

मैं फिर भी हार गया...

तुरुप का इक्का था पास मेरे...
मैं फिर भी हार गया...
हर एक हथियार था पास मेरे ...
मैं फिर भी हार गया...

मोहब्बत में बसा था मेरे दर्द का जहाँ 
हर एक खंजर पे मिला अपनों का निशाँ...
करके टुकड़े दिल के हज़ार मेरे...
मैं फिर भी हार गया...

मेरे उजालों में छुपे अँधेरे कितने ...
गम के सागर में डूबे किनारे कितने...
छुप छुप कर बहाए दिल ने आंसू मेरे...
मैं फिर भी हार गया...

भावार्थ...

 







Thursday, August 9, 2012

मैं इस उम्मीद पे डूबा की तू बचा लेगा ...

मैं इस उम्मीद पे डूबा की तू बचा लेगा ...
इससे बढ़ कर तू मेरा इम्तेहान क्या लेगा...

में बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा ...
कोई चराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा...

अब उसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा...

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए...
जो बे अमल हो वो बदला किसी से क्या लेगा...

अब उसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा...

में उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे...
लकीर हाथ की अपनी वो सब जला लेगा...

अब उसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा...

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उससे रिश्ता वसीम ...
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा...

वसीम बरेलवी...

Saturday, July 21, 2012

इश्क की धुंध...

इश्क की धुंध...
इश्क की धुंध ...

तलाश जिसमें  गुम  हुई ...
प्यास जिसमें फिर न रही...
तू जिसमें तू नहीं में जिसमें मैं नही ...

इश्क की धुंध ...
इश्क की धुंध...

निगाह के उस फलक तक...
रूह के जिस्म तलक तक...
मेरी चाह से तेरी चाह तक...

इश्क की धुंध...
इश्क की धुंध...

खाबो के दरमियाँ...
है यहाँ जो है वहां...
ओस का जो हैं जहां...

इश्क की धुंध...
इश्क की धुंध...

भावार्थ


Friday, July 20, 2012

है कोई तो जरूर बात...

है कोई तो जरूर बात...
है कोई तो जरूर बात...

वहशी हुई हर नज़र है क्यूं...
सनसनी सी हर खबर है क्यूं...
चीखता सा ये दिन है क्यों...
क्यूं जागती से रहती  है रात....

है कोई तो जरूर बात...

हैवानियत के ये नृत्य क्यूं...
लालाच के  हैं ये कृत्य क्यूं...
हुक्मरान की ये दरिंदगी ...
क्यों सत्य के कोई नहीं है साथ...

है कोई तो जरूर बात...

भावार्थ...

Sunday, July 8, 2012

सच है वक़्त बदल रहा है...

सच है वक़्त बदल रहा है...
कागज़ पे अलफ़ाज़ नहीं रहे...
गुलजारों में कूकते साज नहीं रहे...
छुप सकें अपनों में वो राज नहीं रहे...

सच है वक़्त बदल रहा है...
जमीन को पूजने वाले किसान नहीं रहे...
नयी सोच लिए नौजवान नहीं रहे...
तिरंगे के जूनून के निशान नहीं रहे...

सच है वक़्त बदल रहा है...
रिश्तो में वो मिठास नहीं रही...
खुदा से बाशिंदों को आस नहीं रही...
दुआएं लिए माँ अब पास नहीं रही...

सच है वक़्त बदल रहा है...

भावार्थ...




Friday, July 6, 2012

जागने की भी जगाने की भी आदत हो जाए...

जागने की भी जगाने की भी आदत हो जाए...
काश तुझे भी किसी शायर से मोहब्बत हो जाए...
दूर हम कितने दिनों से हैं ...
फिर न कहना अमानत ख़यानत  हो जाये...
जुगनुओं तुमको नए चान्द उगने होंगे...
इससे पहले की अंधेरो की हुकूमत हो जाए...
उखड़े पड़ते हैं मेरी कब्र के पत्थर हर दिन...
तुम जो आ जाओ किसी दिन तो मरम्मत हो जाये...

खुश्क दरियाओं में हलकी सी रवानी और है...
रेत के नीचे अभी पानी और हो....
बोरिये पर बेठिये कुल्हड़ में पानी पीजिये।...
हम कलंदर है हमारी मेजबानी और है...

राहत इन्दौरी !!!




Friday, June 22, 2012

जूनून-ए मर्दा !!!

वो पड़ी धुल को भी एक गुबार बनाएगा...
नन्हे दिए को आंधियों में भी जलाएगा ...
हथेली पे सरसों भी नहीं उगती यु तो...
वो उन्ही लकीरों से सल्तनत बनाएगा...

कोई तो पलक उठाओ कोई तो नज़र फेरो...
कोई तो लब से बोलो कोई तो अधर उकेरो...
सच को सच नहीं कह सकते तो मुर्दा हो...
रगों में बहते लहू आँखों से भर भर बिखेरो...

भावार्थ

Saturday, June 16, 2012

मैं संग सा हूँ जो तेरे संग हूँ...

मैं संग सा हूँ जो तेरे संग हूँ...
रेत सा हूँ जो न तेरे संग हूँ ...

धनुष इन्द्र सा है मेरा जहाँ...
पानी सा हूँ जो न तेरे रंग हूँ ...

दिल की धड़कन तेरी छुवन है...
जिन्दा लाश हूँ जो न तेर अंग हूँ...

भावार्थ...

Sunday, June 10, 2012

कबीर के दोहे

दुःख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय...
सो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे का होए...

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोय...
औरों को शीतल करे आपहु शीतल होए...

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर...
पंची को छाया नहीं फल लागे अति दूर...

दुर्लभ मानस जन्म है होए  न दूजी बार...
पक्का फल जो गिर पड़ा लगे न दूजी बार...

मांगन मरण समान है मत कोई मांगो भीख..
मांगन से मरना भला यही सत गुरु की सीख..

काशी काबा एक है एक हैं राम रहीम...
मैदा एक पकवान बहुत बैठ कबीरा घीम...

अच्छे दिन पीछे गए हरी से किया न मेत ..
अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत...

~ कबीर ~








कबीर

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंधे मोय ..
एक दिन ऐसा आएगा में रोधुंगी तोय ...

बुरा जो देखन में चला बुरा न मिलया  कोय...
जो मन देखा आपना मुझसा बुरा न कोय...

भला हुआ मेरी मटकी फूट गयी...
पनियां भरण से में अब छूट गयी...

ये तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहीं...
सीश उतारे भू धरे तब बैठे घर माहीं....

हमन हैं इश्क मस्ताना हमन को हुशारी क्या...
रहा आजदी या जग से हमन दुनिया से यारी क्या...

कहना था को कह दिया अब कुछ कहा न जाय...
एक गया जो जा रहा दरिया लहर  समाय ..

हंस हंस कुंठ न पाया जिन पाया तिन रोय ...
हांसी खेल पिया मिले कौन सुहागन रोय...

जाको रखो सैयां माएर सके न कोय।..
बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय...

सुखिया  सब संसार है खाये और सोय..
दुखिया दास कबीर है जागे और रोय ...


कबीर

Friday, June 8, 2012

सदी से इंतज़ार था जिसका वो पल में गुज़र गया...

सदी से इंतज़ार था जिसका वो पल में गुज़र गया...
जेहें का उफनता दरिया एक  लम्हे में उतर गया...

आँखों ने रोका, इशारो ने  समझाया बहुत जिसे...
बड़ा शातिर था  अजनबी  वो दिल में उतर गया...

सांस से सांस बोलती रही गूंगे की तरह लम्हे को...
न जाने अल्फाज बुनने का वो हुनर किधर गया...

सदी से इंतज़ार था जिसका वो पल में गुज़र गया...
जेहें का उफनता दरिया एक लम्हे में उतर गया...

भावार्थ...





Sunday, May 20, 2012

हुए दिन कितने किसीके किस्से नहीं सुने...

हुए दिन कितने किसीके किस्से नहीं सुने...
फुर्सत नहीं देखी चैन के फ़साने नहीं सुने...

दिल के गुबार लोगों के जेहेन पे हावी हैं..
दिल से किसी ने उनके अफसाने नहीं सुने...

कोई तो बात है जो आज वो गमसुम है...
दिलबर ने उल्फत के फकत तराने नहीं सुने...

उसके उसके दिल कि बात लबो में पढ़ी...
आँखों से बोलते अल्फाज़ अनजाने नहीं सुने...

तलाश में सुकून के क्या नहीं सुना उसने ...
उसने शायद कभी शेर कुछ पुराने नहीं सुने...

भावार्थ

Tuesday, May 1, 2012

हिरण समझ बूझ बन चरना ...

हिरण  समझ  बूझ  बन  चरना ...
एक बन चरना दूजे बन चरना  तीजे बन  पग नहीं धरना ...
पांच हिरना  पच्चीस हिरनी उनमें एक चतुर  ना ...
तोये मार तेरो मास बिकावे खल का करेंगे बिछोना...
कहे  कबीर जो सुनो भाई साधो गुरु के चरण चित्त धरना...

Explanation
Traditionally, in Indian spiritual terminology, the Deer symbolizes the senses. However, the more latent meaning of a Deer is our pleasure-seeking desire. Fundamentally, each one of us is looking for pleasure and that search is what is alluded to, in this song, as the grazing of the deer.

The "third" forest is the physical reality guided by our senses. The "second" forest is the mental world that is guided by our mind/intellect - included in this are the visions and sounds heard by sages in meditation. Perhaps, Kabir does not see the internal visual and sound experiences much different from a mental state where thoughts are the driving force. The "first" forest is the true spiritual realm where oneness with the ultimate is complete. So he says its okay to graze in the first forest of oneness and the second forest of meditation/practice but not in the third forest of physical and sensual pleasures.

Why? He explains that in the third forest the pleasure-seeking tendency is at the mercy of the five sensual stimuli (sight, sound, smell, taste and touch) that are the hunters. He warns that one should stay out of their line of attack/vision.

The deer identifies so completely with the five senses that it takes on the form of five deer seeking the pleasures offered in the third forest. Each of these five senses of perception combined with the five motor organs of action (mouth, hand, feet, excretory and reproductive) makes a combination of twenty five different ways (five multiplied with five) in which the physical world is experienced. While, none of these experiences are permanent, all twenty-five pleasure-seeking ways of the physical world continue relentlessly. Kabir says that none of these pleasure-seeking methods are shrewd enough to see this obvious truth.

Eventually this pleasure search at the physical level ends unsuccessfully with the five sensory hunters "killing" the spirit of the search. Each of these modes become non-living/dead reality that serve as mere external display for feeding, beautifying and adorning the physical world.

So what is the way out of this bleak and hopeless reality? Kabir explains that the root of this transient mode of pleasure seeking is the mind. And therefore instead of controlling the senses, the mind needs to be tamed. But that's a daunting task in itself. Therefore Kabir, in all humility, says that the mind should be offered at the feet of the Guru (within) to show the way, directing it inwards to the true storehouse of pleasure - one that is abundant with everlasting ecstasy.

Monday, April 30, 2012

My Fav 11...

१. अंखियों के झरोकों से... रविन्द्र जैन
२. होठों से छु लो तुम... इन्दीवर
३. हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू... गुलज़ार
४. हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी ...जावेद अख्तर
५. कभी कभी मेरे दिल में... साहिर लुधियानवी
६. तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी , गुलज़ार  
७. लग जा गले कि ये हसी रात फिर हो न हो... हेमल संपत
८. आज जाने की जिद न करो... फ़याज़ हाश्मी
९. चुपके चुपके रात दिन .... हसरत मोहानी
१०.एक प्यार का नगमा है... संतोष आनंद
११. कसमें वादे प्यार वफ़ा... गुलशन बावरा


Saturday, April 28, 2012

वो खूबसूरत सिलसिला टूट गया...

वो खूबसूरत सिलसिला टूट गया...
बेपनाह लुफ्त-ओ- कैफ लिए
वो  निगाहों का करम  छूट गया... 
वफ़ा की लौ थी  जिसके इश्क में
वो एक यार भी  मुझसे रूठ गया...

भावार्थ








दरिया-ए-सुखन में उबरा हूँ मैं...

जब जिंदगी-ए- सेहरा में डूबा तो ...
दरिया-ए-सुखन में उबरा हूँ मैं...
कुंस-ए-उल्फत  की चाह हुई तो...
तेरे आस्तां पे  ठहरा  हूँ मैं...

तेरी वफ़ा से आज गुफ्तगू करता रहा...
इकतरफा मेरा दिल अपनी कहता रहा...  
दुनिया के सितम उसकी आँखों बोली...
जर्द चेहरा आलम-ए-बेवफाई कहता रहा...

भुलाने का हुनर न होता तो मर जाता...
देखता रहता आफताब को तो मर जाता...
जहर ही मर्ज की दवा है इश्क में भावार्थ...
लबो पे रख  भी लेता  दवा तो  मर जाता...

जिंदगी के बाद इक और जिंदगी जीनी है...
उसके दिल में...
उसकी यादो में...
उसके तसव्वुर में...
उसके खाबो में...
उसके आईने में...
उसकी यादो में...
जिंदगी के बाद एक और जिंदगी जीनी है...


भावार्थ...

Thursday, April 19, 2012

जिंदगी क्या है सांसो का पुलिंदा जैसे….

जिंदगी  क्या है सांसो  का पुलिंदा जैसे….
एक लाश  सा शख्स है जो हो जिन्दा जैसे...

पांच कूंचो पे हुआ बावरा फिरता....
कुछ ढूढने को अपने ही शहर का बाशिंदा जैसे...

समंदर की खाइश में बन गया सेहरा....
अपने करिश्मे पे है  खुदा भी  शर्मिंदा जैसे...

बात बात पे देता है तू दर्द की दुहाई...
फितरत-ए-दर्द हो  आदम को पसीदंदा जैसे ....

उड़ उड़ कर आता है उसी टहनी पे वो ….
इस रूह से निभाने को मरासिम वो परिंदा जैसे....

घर के आंगन और गलियारे न रहेंगे अब....
शहर में निकला है घर जलाने को दरिंदा जैसे...

बिकते है क़त्ल-ए-आम खुले बाजारों में...
हो गया हो लहू  इंसा का बाज़ार में मंदा जैसे ....

भावार्थ...  

कौन सांप रखता है उसके आशियाने में...

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में...
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...

और जाम टूटेंगे इस शराब खाने में...
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में...

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं...
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में...

फाकता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती...
कौन सांप रखता है उसके आशियाने में...
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सर से पांव तक वो गुलाबो का सजर लगता है...
बावरू होते हुए भी छूते हुए दर लगता है...

में तेरे साथ सितारों से गुजर सकता हूँ...
कितना आसान मोहब्बत का सफ़र लगता है...

मुझमें रहता है कोई दुशमन-ए-जानी मेरा...
खुद से तन्हाई मिलते हुए डर लगता है...

जिंदगी तुने मुझे कब्र से कम दी जिंदगी....
पाँव फेलाऊँ तो दीवार से सर लगता है...

बशीर बद्र...

Thursday, April 12, 2012

तुम्हारे बाद...तुम्हारी याद...

तुम्हारे बाद...तुम्हारी याद...
वो हर एक बात...कही तेरे साथ...

में पल पल ही दोहरऊंगी...
जीवन यु जिए जाऊंगी...
जैसे मुझे मिली ही सजा...
तेरी याद ही अब तेरी जजा...

तुम्हारी याद...तुम्हारे बाद....
वो हर एक बात...कही तेरे साथ...

आँगन वही, रातें वही...
चांदनी के तले, बस तू ही नहीं...
दुखता है जिया...बिन तेरे पिया...
अन्धियरा है पर न जलता दिया ...

तुम्हारे बाद... तुम्हारी याद....
वो हर एक बात... कही तेरे साथ...

किस का सिला जो ये गम मिला...
इस कदर चाह का  है तुझसे  गिला...
तू अब दूर जा न अब याद आ...
ये अक्स तोड़ दिल के पार जा...

तुम्हारे बाद तुम्हारी याद...
वो हर एक बात... कही तेरे साथ....


भावार्थ...

Wednesday, April 11, 2012

बच्चो पे लदा बचपन क्यों है... !!!


बच्चो पे लदा बचपन क्यों है...
उजड़ा हुआ ये गुलशन क्यों है...

पल से बने दिन दिन से बने साल....
गुजरता जा रहा लम्हा हर  कमाल...

खुदा तेरी इनायत कम क्यों है...
बच्चों पे लदा बचपन क्यों है...

लोरी सुनने वाले लोरी सुनाएं...
खुल के हसने वाले क्यों रोते जाएँ...

तकदीर से इनकी अनबन क्यों है...
बच्चो पे लदा बचपन क्यों है...

सजा किस बात की पाए तू...
हादसे सी जिंदगी क्यों जिए जाए तू...

तेरी कोमल राहों में अड़चन क्यों है...
बच्चो पे लदा बचपन क्यों है...


भावार्थ...

Monday, April 9, 2012

जिंदगी हसीं मुझको लगती नहीं....

जिंदगी हसीं मुझको लगती नहीं....
इंसानियत अब मुझको फबती नहीं...

दर्द से ही उठता हो पर्दा जहाँ...
दर्द से ही गिरता हो पर्दा जहाँ...
दुनिया के आँगन के इस बाग़ में...
धडो में चिर सुलगती  इस आग में...
मोहब्बत नशीं मुझको लगती नहीं...
इंसानियत अब मुझको फबती नहीं...


कुछ बोराए से है सोने की छनकार से...
कुछ गिर गिर पड़े हुस्न की बौछार से...
हर जेहेन को है किसी न किसी का नशा..
जोंक का खून हर हुकुमरान में बसा...
जीने की तमन्ना मुझमें  उठती नहीं...
इंसानियत अब मुझको फबती नहीं...


क्या कहें इन बिखरे जमीरों  की दास्ताँ...
बुत बन के कूंचो पे गाँधी  करते हैं बयाँ...
भूख और रोष की नदी संग बहने लगी...
गुलामी आज़ादी के घर में आके रहने लगी...
सांस इस माहौल  में अब ठिठकती नहीं...
इंसानियत अब मुझको फबती नहीं...

जिंदगी हसीं मुझको लगती नहीं....
इंसानियत अब मुझको फबती नहीं...

भावार्थ...

Saturday, April 7, 2012

और चाहिए फ़राज़ तुझे कितनी मोहब्बतें...

उसने सुकूत-इ-शब् में भी अपना पयाम रख दिया...
हिज्र की रात बाम पर माह-ए-तमाम रख दिया...

आमद-ए-दोस्त की भी कूए वफ़ा में आम थी...
मैंने भी  भी चराग सा दिल सरे-ए-शाम रख दिया...

शिद्दत-ए-त्रिष्णगी में भी गैरत-ए-मयकशी रही...
उसने जो फेर ली नज़र मैंने भी जाम रख दिया...

देखो ये मेरे खाब थे देखो ये मेरे जख्म है..
मैंने तो सब हिसाब-ए-जाँ बस सरेआम रख दिया...

उसने नज़र नज़र में ही ऐसे भले सुखन कहे...
मैंने तो उसके पाँव में सारा कलाम रख दिया...

और चाहिए फ़राज़ तुझे कितनी मोहब्बतें...
माओं ने तीरे नाम पे बच्चों का नाम रख दिया...


अहमद फ़राज़ !!!

अहमद फ़राज़ !!!

दाग दामन के हो दिल के हो या चहेरे के फ़राज़...
कुछ निशाँ वक़्त की रफ़्तार से लग जाते हैं ...

जरा सी गर्द-ए-हवस दिल पे ठीक है फ़राज़...
वो इश्क ही क्या जो दामन पाक चाहता है...

आशिकी में मीर जैसे खाब मत देखा करो...
बावले हो जाओगे महताब मत देखा करो...

वाशातें बढती गयी हिज्र के अजार के साथ...
अब तो हम बात भी नहीं करते गम खर के साथ...

अहमद फ़राज़ !!!

Friday, April 6, 2012

उन खंडहरों तक ये इंसानियत पहुंची...

उन खंडहरों  तक ये इंसानियत पहुंची...
वीरानियों तक उसकी वहशियत पहुंची...

दर्द की गूँज कूंचो पे हुई बेगानी...
हाथ से पहले भीड़ की नसीहत पहुंची...

मौत का मर्ज लिए जिंदगी फिरती है...
उस मुकाम तक मेरी तबियत पहुंची...

जिंदगी जीने का सबब न जाना हमने...
खुदा की मेहर से पहले शरियत पहुंची...

पाट दो ये दीवारों से झांकती  खिड़कियाँ...
वादा-ए-झूठ से पहले असलियत पहुंची...
भावार्थ

Thursday, April 5, 2012

नशा मय में नहीं उतना जो ग़ज़ल में हैं...

नशा मय में नहीं उतना जो तेरी ग़ज़ल में हैं...
मजा शय में नहीं उतना जो तेरी वसल में है...

नाम जिससे मिला उसी ने बदनाम किया...
उससे कहाँ तक बचें हम जो नसल में है...

सजदे को तरसते सर इबादत को तरसते धड...
अफकार बन गया है खुदा जो असल में है...

नशा मय में नहीं उतना जो तेरी ग़ज़ल में हैं...
मजा शय में नहीं उतना जो तेरी वसल में है...

भावार्थ..


Friday, March 30, 2012

अशरार !!!

अशरार !!!

किसी को वफ़ा किसी को मोहब्बत तो किसी को जिस्म मिला...
एक नाजनीन से हे हर एक आशिक को  अलग तिलिस्म मिला...

आतिश जो कहा इश्क को तो गुबार से घबराना कैसा...
डूब ही गए जब दरिया में तो तैर कर फिर जाना कैसा...
आगाज़ से अंजाम तक मोहब्बत एक पहेली है भावार्थ...
जिंदगी उलझ जाए जिसमें उसे उम्र भर सुलझाना कैसा...


अदाओं के खंजर से, नजाकत के जादू से यहाँ कोई न बचा..
तुझे बाँधने को फितरत-ए-आदम मौला ने क्या क्या न रचा..

भावार्थ...

उसका जो गर नज़ारा हो...

उसका जो गर नज़ारा हो...
तो मौत भी  हमको गवारा हो...

तड़प में कैफ मिलने लगे...
पतंगे को जो दिए का इशारा हो... 

रात-ओ-आफताब की मोहब्बत...
ज्यूं जुदाई में इश्क का शरारा हो...

शहर भीड़ ने पुछा आंसू का सबब...
डूबते को जैसे तिनके का सहारा हो...

भावार्थ...

Wednesday, March 28, 2012

उसे समझा अपना हमने...

उसने दिल को जो लगाया तो उसे समझा अपना हमने...
हंस के जो हाथ बढाया तो उसे समझा अपना हमने...

बोझिल हुई आँखों ने सुनी उस पे गुजरी हुई ...
हाल-ए- दिल जो बताया तो उसे समझा अपना हमने...

कदमो में हुई हल चल तो मंजिल हुई नसीब...
फिर रस्ता जो बन आया तो उसे समझा अपना हमने...

हाल हुआ बेहाल जब  उस अजनबी से मिली नज़र...
दीवाना जो नाम पाया तो उसे समझा अपना हमने...

माथे पे लकीरों का नहीं निशाँ, है हथेली भी खाली...
खुदा की जो पड़ी नज़र  तो उसे समझा अपना हमने...

दुनिया की बेचैन फिजाओं में रही बेकल सी रूह मेरी....
बँजर जेहेन में सुखन-ए-लहर को समझा अपना हमने...

बाज़ार सजे हैं बिकने को आज फिर इस शाम...
खरीददारों ने लगाया जो भाव उसे समझा अपना हमने...

उसने दिल को जो लगाया तो उसे समझा अपना हमने...
हंस के जो हाथ बढाया तो उसे समझा अपना हमने...

भावार्थ...  

Monday, March 26, 2012

हो सके तो खुद को संभालो...

हो सके तो मुस्कुरालो...
हो सके तो मुस्कुरालो...

इस गम को कहीं छुपा लो....
हो सके तो खुद को संभालो...

कुंस है रह जायेगा...
दर्द है बह जायेगा...

हो सके तो खुद को संभालो...
इस गम को कहीं छुपा लो...

जेहेन में न वो बात आये...
खुदा करे न वो रात आये...

खुद से खुदी को बचालो...
हो सके तो मुस्कुरालो...

तुझ बिन तेरी आरजू तो है...
जो नहीं है तू जुस्तजू तो है...


मौत को जिंदगी से बचालो...
हो सके तो खुद को संभालो... 


भावार्थ...

Sunday, March 25, 2012

मेरे दिल...

बिखरने से पहले संभल जा...
उससे मिलने से पहले संभल जा...

मेरे दिल...
मेरे दिल...
मेरे दिल...

नज़र का असर जब होने लगे...
अदा  का  कहर जब होने लगे...

बिखरने से पहले संभल जा...
उससे मिलने से पहले संभल जा...

मेरे दिल...
मेरे दिल...
मेरे दिल...

कातिल क़त्ल हो  जाएगा...
अजनबी से वस्ल हो जायेगा...
 
बिखरने से पहले संभल जा...
उससे मिलने से पहले संभल जा...

मेरे दिल...
मेरे दिल...
मेरे दिल...

भावार्थ...

क्या फायदा... !!!

Monday, March 19, 2012

मेरी तमन्नाओ का बाज़ार तू...

अब की हम खेलय होरी पर रंग नहीं सुहाय...
बिरह घोर अन्गुरियन में अंसुअन दिए लगाय...

नज़रो का रंग तू  गालो का गुलाल तू...
दिन का आफताब तू शब् का हिलाल तू....

मंजर हुआ नसीब जहाँ खुद को दिया भुलाय...
बिरह घोर अन्गुरियन में अंसुअन दिए लगाय...

में गर गुल तो गुलज़ार तू...
मेरी  तमन्नाओ का बाज़ार तू...

बिसरा के होश खुद को कमली दिया बताय...
बिरह घोर अन्गुरियन में अंसुअन दिए लगाय...

अब की हम खेलय होरी पर रंग नहीं सुहाय...
बिरह घोर अन्गुरियन में अंसुअन दिए लगाय...

भावार्थ...

मगर तुम नहीं आये ...

आज फिर मैं हूँ तनहा...
है आज फिर वही गम  ...
आज फिर मुन्तजिर हूँ
आँख आज फिर रही  नम...

मगर तुम नहीं आये ...
मगर तुम नहीं आये...

किस कदर तेज चलती ये साँसे...
दर्द तोलती हैं बेबस ये  आहें...
किस कदर छाई तेरी ये यादें...
कुंस बोलती हैं  बेकस ये बाहें...

मगर तुम नहीं आये ...

मगर तुम नहीं आये...

भावार्थ...

Saturday, March 17, 2012

शेर कुछ पुराने नहीं सुने...

हुए दिन कितने वो किस्से पुराने  नहीं सुने...
फुर्सत नहीं देखी चैन के फ़साने नहीं सुने...

दिल के गुबार लोगों के जेहेन पे हावी हैं..
दिल से किसी ने उनके अफसाने नहीं सुने...

कोई तो बात है जो आज वो गमसुम है...
दिलबर ने उल्फत के फकत तराने नहीं सुने...

उसके दिल कि बात सबने लबो से पढ़ी...
आँखों से बोलते अल्फाज़ अनजाने नहीं सुने...

तलाश में सुकून के  क्या नहीं किया ...
उसने शायद कभी शेर कुछ पुराने नहीं सुने...


भावार्थ

Friday, March 16, 2012

दिए के दिल से यूँ कराह निकली...

दिए के दिल से यूँ कराह निकली...
हवा शाम की वो जैसे बेवफा निकली...

वो जो मचल रही थी तरंग भीतर...
बस कुछ एक पल की चाह निकली...

जुस्तजू मौत की करते रहे हम...
जींद से दोस्ती उसकी बेपनाह निकली...

मंजिल की तलाश में हम तो होश में थे ...
क्या करते जो आवारा हमारी राह निकली...

दफ़न करने को दुनिया मुन्तजिर उसकी   ...
ढूढा तो वो मेरी रूह में जिन्दाह निकली..

जलते जलते फिर बुझ गया वो चिराग...
हवा शाम की वो जैसे बेवफा निकली...

भावार्थ...

Thursday, March 15, 2012

गर खुदा है तो !!!

गर खुदा है तो फिर क्यों नज़र नहीं आता...
दुआ हैं तो उनका क्यों असर नहीं आता...

फिर नदी से गुजरा फिर एक सिक्का फैंका...
जूनून-ए-मज़हब सर से क्यों उतर  नहीं जाता...

अपनों को छोड़ गैरों को खैरात बांटते लोग ...
बौराए  लोगो का  दौर अब क्यों गुजर नहीं जाता...

वीरानो की तलाश में भागती भीड़ देखो...
माँ के साए में कोई क्यों रहकर नहीं जाता...

जो देखो वही लत-ए-जिंदगी का शिकार हुआ...
इस बद-हवासी से कोई क्यों बचकर नहीं जाता...

दौलत के जखीरे न जाने किस समंदर में गुम हों...
मुस्कुराहट किसी और के नाम क्यों कर नहीं जाता...

गर खुदा है तो फिर क्यों नज़र नहीं आता...
दुआ हैं तो उनका क्यों असर नहीं आता...

भावार्थ...

Monday, March 12, 2012

दीप जिसका मोहल्ला धीमे जले !!!

दीप जिसका मोहल्ला धीमे जले...
चंद लोगों की खुशियों को ले कर चले...
वो हर साए में हर मसलियत के पले...
ऐसे दस्तूर को...
सुबह बेनूर को...
में नहीं मानता मैं नहीं जानता...

मैं भी खरिफ नहीं तख़्त-ए-दार से...
मैं भी मंसूर हूँ कह तो अगियार से...
क्यों डराते हो जिन्दों की दीवार से...
जुल्म की बात को...
जेहेल की रात को...
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता...

फूल साखों पे खिलने लगे तुम कहो...
जाम रिन्दों को मिलने लगे तुम कहो...
चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो...
इस खुले झूठ को
जेहेन की लूट को..
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता...

तुमने लूटा है सदियों हमारा सुकून...
अब न हम पर चलेगा तुम्हार फिसून...
चार अगर दर्द मंदों के बनते हो क्यों...
तुम नहीं चार गर...
कोई माने मगर...
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता...


हबीब जलीब !!!








कह दो वो दिल की बातें

कह दो वो दिल की बातें तुम्हारे दिल में आती हैं,

जो मेरी समझ से परे हैं पर वो तुम्हे बड़ा सताती हैं।

ये बेकरारी रातो की कुछ खयालो का ही सिला होगा,

कह दो वो अफसाने जो ये रात बस तुम्हे सुनाती हैं

पल-पल जिस टीस ने तुम्हारे जेहेन को झकझोरा है,

ख़ुद सोती याद मेरी और ना ही तुम्हे सुलाती है

सालो के मलहम से तेरे चाक जो सारे सिल पाये,

ये मुझसे जुड़ी कसक तुम्हे भी वहीँ-वहीँ दुखाती है


अक्ल की बात सदा ही तुम्हारे लबों तक पहुँची है,

मन में भी तुम्हारे बात कोई सपने नए सजाती हैं।


कह दो वो दिल की बातें जो तुम्हारे दिल में आती हैं,

जो मेरी समझ से परे हैं पर वो तुम्हे बड़ा सताती हैं



भावार्थ... Labels: भावार्थ scheduled 12/27/08 by No Mad Explorer....

झूठी मूटी नींद में देखे !!!

झूठी मूटी नींद में देखे कुछ सपने झूठे मैंने भी...
सच्चे रिश्तो में है देखे कुछ अपने झूठे मैंने भी...
मिटटी की बुत है मिटटी की इस कलियुग में...
पत्थर से है बहते हैं देखे कुछ झरने झूठे मैंने भी...

भावार्थ  

एक बस तू ही नहीं

एक बस तू ही नहीं मुझसे खफा हो बैठा...
मैंने जो संग तराशा वो खुदा हो बैठा...

उठकर मंजिल ही आये तो शायद कुछ हो...
शौक-ए-मंजिल तो मेरा अब रफा हो बैठा...

मसले हत छीन गयी कुव्वाते गुफ्तार मगर...
कुछ न कहना भी मेरी सजा हो बैठा...

शुक्रिया ए मेरे कातिल इ मसीहा मेरे...
जहर जो तुने दिया वो दवा हो बैठा...

एक बस तू ही नहीं मुझसे खफा हो बैठा...
मैंने जो संग तराशा वो खुदा हो बैठा...





एहशान दानिश...  

वो हमसफ़र था !!!

वो हमसफ़र था मगर उससे हम-नवाई न थी...
धुप छाव का आलम रहा मगर जुदाई न थी...

कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं  रहे...
जब तक हमारे रहे वो हम नहीं रहे...
अदावतें थी तगाफुल था रंजिशें थी मगर...
बिछड़ने वाले में सब कुछ था बेवफाई न थी...

वो हमसफ़र था मगर उससे हम-नवाई न थी...

धुप छाव का आलम रहा मगर जुदाई न थी...

बिछड़ते वक़्त उन आखों में थी हमारी ग़ज़ल...
ग़ज़ल वो भी जो अभी किसी को सुनाई न थी...

वो हमसफ़र था मगर उससे हम-नवाई न थी...
धुप छाव का आलम रहा मगर जुदाई न थी...
काज़ल डारूं किरकिराए सुरमा सहा न जाए...
जिन नैनं में पिय बसें कोई और न समय...
किसे  पुकार रहा था डूबता रहा दिन...
सदा तो आई थी लेकिन कोई दुहाई न थी...

वो हमसफ़र था मगर उससे हम-नवाई न थी...
धुप छाव का आलम रहा मगर जुदाई न थी...

कभी ये हाल कि दोनों में यक्दिली थी नसीर...
कभी ये मरहला कि आशानाई न थी...

वो हमसफ़र था मगर उससे हम-नवाई न थी...

धुप छाव का आलम रहा मगर जुदाई न थी...

नसीर तुराबी   !!!


ये वीराना भी कभी आबाद था...

ये वीराना भी कभी आबाद था...

हरे भरे गलियारों से...
घर के चौक दुवारो से...

ये वीराना भी कभी आबाद था...


इस मैदान में बचपन बीता है...
यहाँ शोर चुपचाप आज भी जीता है...

ये वीराना भी कभी आबाद था...

होली का रंग इंटो में आज भी लिपटा सा है...
दिए की लौ का धुआं कौने में  चिपटा  सा है...

ये वीराना भी कभी आबाद था...


क्या हुआ जो आज बुजुर्ग नहीं रहे...
दुआ नहीं रही उनके तजुर्बे नहीं रहे...

इस कैमरे ने कैद कर ही लिया...
मैंने देखा तो दिल ने कह ही दिया...

ये वीराना भी कभी आबाद था...
भावार्थ..  

Sunday, March 11, 2012

तुम से मिलकर

मौत जिंदगी में और जिंदगी जीने में मायने ढूढती है...
हर रूह जो तनहा है दिल की बात कहने को आईने ढूढती है...

तुम से मिलकर कुछ बदल सा जाता हूँ...
नशे में रह कर भी   संभल सा जाता हूँ...

भावार्थ









Monday, March 5, 2012

दरिया सी वो कायनात !!!

दरिया सी है  कायनात वो जिसमें  डूबता सा जाता हूँ मैं ...
आगोश में जिसके  रेत की तरह   टूटता  सा जाता हूँ मैं...

खुद से बेख़ौफ़ हो गया अब किसी का खौफ क्या...
इमारत-ए-रूह, जकड-ए-जेहेन से छूटता सा जाता हूँ मैं...

नशा कांच के अक्स के सिवा इस  मिटटी मैं भी है...
एक नशे को छोड़  उस नशे को लूटता  सा जाता हूँ मैं...

जन्नत-ए-जींद के साहिल पे आज फिर दरिया से उबरा हूँ मैं...
रोग-ए-मौत का इलाज़ करने को उसी में कूदता सा जाता हूँ मैं...

जन्नत-ए-हयात  गर है बस यही तो खाब-ए-जन्नत न सही...
जितनी बार ये नसीब उससे  मूह फेर के लौटता सा जाता हूँ मैं...

गुल निखत  , रंग दिए, रौशनी महक, ये गुलिस्ताँ-ओ- आफताब ....
कैद कर सब हर्फ़ में  ले जिंदगी तुझसे दूर छूटता सा  जाता हूँ मैं...

काबे की   इबादत  बेअसर हुई बुत खाने में किये  सजदे भी  न लगे ...
खुदा-ओ-शिव  हैं भी  या है वहम ये सवाल पूछता  सा जाता हूँ मैं...


दरिया सी है कायनात वो जिसमें डूबता सा जाता हूँ मैं ...

आगोश में जिसके रेत की तरह टूटता सा जाता हूँ मैं...

 भावार्थ...

Sunday, March 4, 2012

जिंदगी से दोस्ती की...

एक हद तक हमने उन दोस्तों  से दोस्ती की...
तन्हाई से  हुई वस्ल तो  जिंदगी से  दोस्ती की...

कब तक बीते कल की कैफियत में जीते हम....
हमारे आज ने  फिर आरहे कल से  दोस्ती की...

सब दोस्त अपनी दुनिया में  होते गए गुम...
वहशी ने फिर उस नाजनीन से दोस्ती की...

कहते भी तो किससे कहते जेहेन की हलचल...
तल्खियों ने मेरी  फिर इस ग़ज़ल से दोस्ती की...

कब तक बहलाते बीती यादों से   दिल को...
जीने को जिंदगी फिर मशीनों  से दोस्ती की...

कनक बे-असर और चांदी  फीकी थी उन दिनों...
बेसब्र तमन्नाओं के लिए कागज़ से दोस्ती की...

मैं अगर मैं था तो अपने दोस्तों  की महफ़िल में...
रिश्ते  निभाने को मैंने एक नए चेहरे से दोस्ती की...

एक हद तक हमने उन दोस्तों से दोस्ती की...

तन्हाई से हुई वस्ल तो जिंदगी से दोस्ती की...
भावार्थ...

Monday, February 27, 2012

वक़्त-ए-रुखसत अलविदा

चुपके चुपके रार दिन आंसूं बहाना याद है...
हमको अब तक आशिकी का वो जमाना याद है...

बेरुखी के साथ सुनना दर्द-ए-दिल की दास्ताँ...
वो कलाई में तेरा कँगन घुमाना याद है... 

वक़्त-ए-रुखसत अलविदा का लफ्ज़ कहने  के लिए...
वो तेरे सूखे लबो का थरथराना याद है..

हसरत मोहनी !!!

These two "shers" are not there in popular song... but they were there in orginal gazal written by hasrat mohani in 1909..

Sunday, February 26, 2012

कुछ और बात करो...

छोड़ो भी ये दुनियादारी अब कुछ और बात करो...
बहुत बढ़ गयी जानकारी अब कुछ और बात करो...

जितने  भीतर उतने बाहर खेल हैं खिलाडियों के
क्रिकेट में फिर हार गए क्या ? कुछ और बात करो...

गाडी का क्या है बस चलती है चलती ही जाए...
पडोसी  ने ले ली नयी फरारी तो कुछ और बात करो...

भ्रस्टाचार का दर्जा कितना नीचा अपनी नज़र में...
हवलदार जी  रखो सौ की पत्ती कुछ और बात करो...

बदल जाए ये दुनिया पल में राम राज फिर आ जाये....
नौबत आये खुद को बदलने की तो कुछ और बात करो...


छोड़ो भी ये दुनियादारी अब कुछ और बात करो...

बहुत बढ़ गयी जानकारी अब कुछ और बात करो...

भावार्थ...

Saturday, February 25, 2012

मजाज़ लखनवी...

हमदम यही है रहगुज़र-ए-यार-ए-खुशखिराम...


गुज़रे हैं लाख बार इसी कहकशां से हम...

मजाज़ लखनवी...





(hamdam : companion; rahguzar-e-yaar-e-khushkhiraam : pathway of the joyous and graceful gait of the beloved; kahkashaaN : galaxy)



Tuesday, February 21, 2012

मैं यूँ बेवफा न होता..

दुनिया के पैमाने पे कसा उसने ...
मेरी मोहब्बत भी गर तोली होती...

गुबार दिल में लिए फिरती रही...
दो लफ्ज़ भी वो गर बोली होती...

कितने खाब सजाये थे उसने भी...
दीदार को आँख जो गर खोली होती...

मैं उससे जुदा न होता...
मैं   यूँ बेवफा न होता....

भावार्थ


पूछती है अजन्मी परी....

जिंदगी  कोख से खफा क्यों है...
मोहब्बत जिंदगी से खफा क्यों है...
इंसान  मोहब्बत से खफा क्यों है...
खुदा इंसान से खफा क्यों है...
इबादत खुदा से खफा क्यों है...
दिल इबादत से खफा क्यों है...
पूछती है अजन्मी परी....

भावार्थ...

STOP ABORTION.....


Monday, February 20, 2012

दुनिया जीतने का खाब भुला मैंने...

दुनिया जीतने का खाब भुला मैंने...
खुद को जीतने का मन बनाया है...
कांच से चमकते आशियाने को छोड़...
मिटटी में रमने का मन बनाया है...

जिंदगी क्या है हर छिन बदलती काया...
सांस दिए सी पल पल जल बुझ रही है...
कोई किवदंती सी जो सुनी सुनी सी है...
या कोई पहेली सी जो बस उलझ रही है...

दर्द कोई छोटा नहीं और ख़ुशी कोइम बड़ी नहीं...
कहाँ से पैमाना शुरू हो और कहाँ ख़तम...
भंगुर रिश्तो की गहराई कैसे तय करूँ...
भीतर का सफ़र कहाँ शुरू हो और कहाँ ख़तम...

माया कोई हवा नहीं कोई अफकार नहीं...
भयावय दलदल है जिसमें डूबता जाता हूँ...
खुद ने जना है इसके कतरे कतरे को मैंने...
उबरने की तड़प है मगर डूबता जाता हूँ...

बस में क्या है मेरे कुछ भी तो नहीं...
भागने में गिरने तो कभी चलने में रुकने का डर है...
क्या हासिल मुझे और क्या हासिल नहीं...
पाने में खोने का तो कभी खोने में पाने का डर है...

पा भी लिया सब तो भी बसर अधूरा ही रहा...
बसर राह मिली तो भी सजर अधूरा ही रहा...
मंजिल मिल गयी  तो भी मंजर अधूरा ही रहा...
मंजर पे मैं हूँ मगर तो भी सफ़र अधूरा ही रहा...

तभी तो अधूरे सफ़र को पूरा करने को...

दुनिया जीतने का खाब भुला मैंने...
खुद को जीतने का मन बनाया है...
कांच से चमकते आशियाने को छोड़...
मिटटी में रमने का मन बनाया है...

भावार्थ...

तन्हाई !!!

आज फिर तन्हाई ने टटोला मुझे...
मालूम है क्या मिला उसको...
तुम्हारी यादो के कुछ गुच्छे ...
धडकनों में बेसब्री की पोटली...
आँखों में गम की लड़ियाँ...
दिल में तड़प के पुलिंदे...
साँसों में गुथा तुम्हारा नाम...
रगों में घुला तुम्हारा वजूद...
पलकों में बंधा तुम्हारा इंतज़ार...
होठो पे चढ़ा तुम्हारा खुमार...
हाथो में उकेरी तुम्हारी लकीरें...
बालो में उँगलियों के निशाँ..
और आईने में तुम्हारी सूरत...
ये सब देख लौट गयी तन्हाई...
मुझे फिर तनहा छोड़ कर...

भावार्थ...

Saturday, February 18, 2012

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...
याद रह जाएगी ये  रात करीब आ जाओ...

एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की...
आज बसमें नहीं जज्बात करीब आ जाओ...

सर्द झोंको से भड़कते हैं बदन में शोले...
जान ले लेगी ये बरसात करीब आ जाओ...

इस कदर हमसे झिझकने के जरूरत क्या है....
जिंदगी भर का है अब साथ करीब आ जाओ...

दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ...

याद रह जाएगी ये रात करीब आ जाओ...

साहिर लुधियानवी...





Wednesday, February 15, 2012

लोग कहते हैं कि मैं बावरा हूँ...

मेरी अक्ल से झांकता है  मेरा दिल...
और लोग कहते हैं कि मैं बावरा  हूँ...

मेरी मंजिल है सब मन्जिल पाएं....
गम भी आंसू  भर भर के मुस्कुराएं...
याद सब की संभालता है मेरा दिल...
और लोग कहते हैं कि मैं बावरा हूँ...

औरो के दर्द हो  तो नम हैं आँखें मेरी....
थामने बहके हुए को हैं खुली बाहें मेरी...
तनहाई अजनबी की बांटता है मेरा दिल...
और लोग कहते हैं कि मैं बावरा हूँ...

दोस्त एक लम्हा है दोस्ती मंजिल है...
लम्हा न हो तो जिंदगी बोझिल है...
मंजिल को  रास्ता मानता है मेरा दिल....
और लोग कहते हैं कि में बावरा हूँ...

मेरी अक्ल से झांकता है मेरा दिल...

और लोग कहते हैं कि मैं बावरा हूँ...







Tuesday, February 14, 2012

वही हद है मोहब्बत की...

जब आंसू गालो तक आयेंगे....
जब दर्द गले में भर आयेंगे....
जब सेलाब आँखों से उतर आयेंगे...
वही हद है उल्फत की...
वही हद है मोहब्बत की...

जब ख़ामोशी इर्द गिर्द चिल्लाएगी....
जब तन्हाई बाहँ खोले बुलाएगी...
जब बदहोशी जेहेन में समाएगी...
वही हद है उल्फत की...
वही हद है मोहब्बत की...

जब बात  दीवारों के पार आ जाये...
जब इज्ज़त कूंचो पे उछाली जाये ....
जब किस्सा  अफसाना बनता जाये...
वही हद है मोहब्बत की...
वही हद है मोहब्बत की...

भावार्थ

Sunday, February 5, 2012

और मुझे होश आये...

अब कुछ मोजजा हो...
और मुझे होश आये...
बेहोशी टूटे जिंदगी की...
और फिर होश आये...
मन ही से हारा हूँ मैं ...
बुझा सा तारा हूँ मैं ...
बोझिल सा किनारा हूँ मैं ...
काश  वो जोश आये...
और मुझे होश आये...
न इबादत का हुआ असर ...
न कोई सजदा ही नसीब....
न अपने की मन्नत लगी....
न कोई दुआ मांगे रकीब...
गम है एहसास का जज्बा....
काश ये दिल खोज लाये....
और मुझे होश आये...

भावार्थ




Friday, February 3, 2012



तुम्हारी सी एक तस्वीर देखी... 
मेरे इर्द गिर्द चलती फिरती...
मुझसे कहती की कहाँ गुम हो... 
क्यों फिर कल में गुम सुम हो...
मेरे पास आओ, बात करो....
पूरी वो अधूरी मुलाकात करो...
रात का वो किस्सा...
गए कल का वो वाकया....
वो गुदगुदी करते कहकहे...
चलो अब सुना भी दो...
और में भी कितना बुद्धू....
तस्वीर को "तुम" समझ बैठा...
लबो पर अलफ़ाज़...
अल्फाजों में हाल....
खुद ब खुद बयान होता गया...
मगर फिर ठिठका पल भर को...
तुमने ये सफ़ेद साड़ी क्यों पहनी है...
पूछ बैठा तुमसे में भी...
बोली तुमने "पेन्सिल" उठाई है " भावार्थ"...
और पेन्सिल से लकीरें बनती है...
तस्वीर बनती है उसमें रंग नहीं....
और तुम फिर तस्वीर  बन गयी...
मैंने फिर गुम हो गया इसे सोच में...
की वो तुम थी या तुम्हारी तस्वीर...

भावार्थ...

मायने

हैराँ हूँ परेशाँ हूँ...
इस जिंदगी के मायने क्या हैं ?
जीने के, मरने के...
जिन्दादिली भरने के मायने क्या हैं ?
जो दिल चाहता है वो दुनिया नहीं....
और जो दुनिया चाहे उसे हम नहीं...
यूँ घुटने के यूँ टूटने के...
यूँ ही अरमा फूटने के मायने क्या हैं...
ये उमंग जो सिर्फ तरंग भर है...
पल को जिस्म जो  संग भर है...
जानकर भी अनजान के मायने क्या हैं...
हकीकत यही तो ठीक नहीं...
तबियत आज फिर ठीक नहीं....
मौत के बाद जिंदगी के मायने क्या हैं....
हैराँ हूँ परेशाँ हूँ....
इस जिंदगी के मायने क्या हैं...

भावार्थ...

Tuesday, January 31, 2012

मेरी नन्ही सी परी छुई मुई...


मेरी नन्ही सी परी छुई मुई...
मेरी नन्ही सी परी छुई मुई...

रंगों को मिलें नए रंग इसके साथ....
खुशियों को आये ख़ुशी संग इसके साथ...
छु के इसको आज ऐसा लगा...
आज मैंने जैसे कायनात छुई...


मेरी नन्ही सी परी छुई मुई...


हँसे तो  सब खिलखिलाने लगे...
रोये तो दिल डगमगाने  लगे...
सबके दिल में है ये ऐसे बसी...
नन्ही जाँ आँखों का जैसे नूर हुई....

मेरी नन्ही सी परी छुई मुई...

भावार्थ


( To my daughter Avanatika ), Born on 24th Jan 2012, 9:12 PM


Monday, January 16, 2012

जुस्तजू मौत की इस कदर दोस्तो...

जुस्तजू मौत की इस कदर दोस्तो...
जिंदगी का नहीं अब असर दोस्तो...

जुस्तजू मौत की इस कदर दोस्तो...


कारवाँ था जो अब तक चलता रहा...
जूनून था जो लहू बन उबलता रहा...
मंजिल बन गयी अब सफ़र दोस्तो...
जिंदगी का नहीं अब असर दोस्तो...

जुस्तजू मौत की इस कदर दोस्तो...


बस एक जिंदगी और एक जान है...
जान जाए वतन पे तो ही  शान है...
जिन्दादिली है  मुख़्तसर दोस्तो...
जिंदगी का नहीं अब असर दोस्तो...


जुस्तजू मौत की इस कदर दोस्तो...

जिंदगी का नहीं अब असर दोस्तो...

भावार्थ...



Saturday, January 14, 2012

~! हाकिम नसीर ~!

आप गैरों  की बात करते हैं ...
हमने अपने भी आजमाए हैं...
लोग कांटो से बच के चलते हैं....
हमने फूलों से जख्म खाए हैं...

~! हाकिम नसीर ~!



लो बुझने चला है एक आदमी....

लो बुझने चला है एक आदमी....
किसी को फ़िक्र न किसी आँख में नमी...

जो अल्फाजों को संजोता रहा...
जो शेर की बाती पिरोता रहा...
जो दिन-ए-उम्र को खोता रहा...

फनकार को चाहने वालो की कमी...
लो बुझने चला है एक आदमी...


बुलंदी मिली और तन्हाई भी....
शोहरत मिली और रुसवाई भी....
उल्फत मिली और बेवफाई भी...

भुलाने लगी उसको खुद सरजमी...

लो बुझने चला है एक आदमी...


कभी नाम पे  कूचे चहकते तो थे....
जिक्र भर से दिल दहकते तो थे...
इश्क के गुलज़ार महकते तो थे...

वक़्त से गुमनाम हुआ वो आदमी...
लो बुझने चला है एक आदमी...

ये सिलसिला है चलता जाएगा....
एक का बाद कोई और आएगा....
दस्तूर दुनिया का न बदल पायेगा...

धधकती लौ दिए की कब है जमी...
लो बुझने चला है एक आदमी....

भावार्थ...

मुझे मालूम है मेरे अपने मशगूल हैं...

मुझे मालूम है मेरे अपने मशगूल हैं...
महीने हो गए उनकी आवाज़ सुने हुए...
और साल हो गयी उनको देखे हुए..
और वो साथ में गुज़ारे हुए लम्हों का एहसास...
वो तो बस एक याद भर है....


Impact of Technology over Human relationships....

Friends together > Meets frequently > Calls Frequently > Chat on google /Yahoo > Wait for "Like" tag on status update or Photo Update.....

( Time has really changed the meaning of togetherness and Friendship)






Friday, January 13, 2012

बारिश ले उडी उसकी सादगी से फुहार...

बारिश ले उडी उसकी सादगी से फुहार...
ओढ़े फिरती है उसकी अदाएं ये बहार...
काँच है कैसी उसकी आँखों जैसी ...
आँच है कैसी उसकी साँसों जैसी...
चांदनी ने माँगा रंग मेरी जाँ से उधार...
बारिश ले उडी उसकी सादगी से फुहार...


अंगार की तपिश उसके नैन-ओ- नक्स से
श्रृंगार की दमक उसके पैने से अक्स से...
मदहोशी-ए-शाम उसके इरादों से...
जन्नत-ए-जिन्द उसके वादों से...
तारों ने मांगी चमक मेरे यार से उधार...
बारिश ले उडी उसकी सादगी से फुहार...


बारिश ले उडी उसकी सादगी से फुहार...
ओढ़े फिरती है उसकी अदाएं ये बहार...

भावार्थ... 

Monday, January 9, 2012

मुक्त हो कर देख क्या होता सच में सुखी...

कितना फक्र है आँखों पे तुझको...
जरा तेजी से घूमा गर पहिया...
तो उल्टा फिरता दीखता तुझको...

कितन फक्र है नाक पे तुझको...
गर गंध हो हवा सी इर्द गिर्द...
तो कुछ न सूझता तुझको...

कितना फक्र है कान पे तुझको...
गर जरा बढ़ जाये शोर एक हद से...
कुछ न सुन पाए फिर तुझको...

कितना फक्र है जीभ पे तुझको...
गर पानी सा हो जो कुछ भी...
कुछ न स्वाद फिर आये तुझको...

कितना फक्र है छूने पे तुझको...
गर सुन्न हो जाए अंग कोई...
न फिर एहसास हो पाए तुझको...

कितनी बेबस है सोचो पञ्च-मुखी माया...
बाँधने चली है जो एक अजर अमर साया...

मूरख है तू हो हुआ जा रहा  बहि-मुखी...
अनंत मस्ती है जरा हो जा तू अंतर मुखी...

अनंत मस्ती है जरा हो जा अंतर मुखी...
मुक्त हो कर देख क्या होता सच में सुखी...

भावार्थ

Saturday, January 7, 2012

अजब मासूम लड़की थी...

अजब दिन थे मोहब्बत के...
अजब दिन थे रफाकत के...
कभी गर याद आ जाएँ तो...
पलकों पे सितारे झिलमिलाते हैं...
किसी की यादों में रात को अक्सर जागना मामूल था अपना...
कभी गर नीद आ जाती तो हम भी सोच लेते थे...
अभी तो हमारे वास्ते वो रोया नहीं होगा...
अभी सोया नहीं होगा...
अभी हम भी नहीं रोते...
अभी हम भी नहीं सोते...
सो फिर हम जागते थे और उसको याद करते थे...
अकेले बैठ कर वीरान दिल आबाद करते थे...
हमारे सामने तारो के झुरमुट में अकेला चाँद होता था...
जो उसके हुस्न के आगे बड़ा ही मांद होता था...
फलक पर रक्स करते अनगिनत सितारों को...
जो हर तरतीब देते थे तो उसका नाम बनता था...
अगले अगले रोज जब मिलते...
तो गुजरी रात की हर बेकली का जिक्र करते थे...
हर एक किस्सा सुनाते थे...
कहाँ किस वक़्त किस तरह  से दिल धड़का बताते थे...
मैं जब कहता की जाना आज तो में जाना...
में एक पल नहीं सोया तो वो कुछ नहीं कहती...
मगर नीद में डूबी उसकी दो झील सी आँखें बोल उठती थी...
में जब उसको बताता था मैंने रोशन सितारों में तुम्हारा नाम देखा था...
तो कहती तुम झूठ कहते हो...
सितारे मैंने देखे हैं समें तुम्हारा नाम लिखा था...
अजब मासूम लड़की थी...
मुझे कहती थी की अबन अपने सितारे मिल ही जायेंगे...
मगर उसे क्या खबर थी की किनारे मिल नहीं सकते
मोहब्बत की कहानी में..
मोहब्बत करने वालों की कहानी में सितारे मिल नहीं सकते...


Source:  Romantic Urdu Poem "Ajab Masoom Ladki Hai" in a beautiful voice of "RJ Hasni Naveed Afridi".
@ Youtube.com

कुछ न होने के एहसास से होता...

कुछ न होने के एहसास से होता...
कुछ होने का एहसास है...
दूरियां बतलाती है तुमको....
असल में तुम्हारे क्या पास है...
जिन्दादिली है तो जिंदगी है...
वरना जिंदगी एक जिन्दा लाश है...
हासिल हो जाना इक्तिफाक है...
जो हासिल न हो तो वही तलाश है...
माटी का पैरहन कुछ एक दिन...
हमेशा रहेगा वो अजर  का लिबास है...
होश क्या है अकल का जागते रहना...
अकल  भी किस कदर बदहवास है...
एक रोज गुज़र जाता है हर रोज...
ये सिलसिला भी क्या क्या ख़ास है...

भावार्थ

Friday, January 6, 2012

तुम ये समझी ना...

तुम ये समझी ना...
ये इश्क है क्या...
ये चाहत है क्या,...
एक तुम्हारे सिवा....

तुम से हूँ में....
मेरी जान है तू...
कैसे ये कहूं...
तुम हो मेरी क्या....

तुम हो मेरी....
ये सब ने कहा....
ये जग ने कहा...
अब जाओ समझ...

तुम ये समझी ना...
ये इश्क है क्या...
ये चाहत है क्या,...
एक तुम्हारे सिवा....

भावार्थ...

Written down based upon Music in Movie Sex&Philosophy ( Iran, 2005)  directed by Mohsen Makhmalbaf.

Listen to that at : http://www.youtube.com/watch?v=VBOpS6FNASI

ये उम्मीद न थी...

ये उम्मीद न थी...
कि वो नहीं आयेगी...
ये उम्मीद न थी...
कि वो रुलाएगी...
जो कभी मुस्कुराने का सबब थी...
जो कभी खुदा थी कभी रब थी...
जिसकी मोहब्बत मेरा पैरहन थी...
जो मेरी निखत मेरी अंजुमन थी...
जिसने मिलने को कभी मीलो कि दूरियां तय की थी...
दुनिया कि तोहमतें और  मजबूरियां तय की थी...
कदम कुछ न चल पाएगी...
ये उम्मीद न थी...
कि वो नहीं आयेगी...
मुझे उम्मीद न थी...
कि वो रुलाएगी...
मुझे उम्मीद न थी...

भावार्थ...

Monday, January 2, 2012

मैं हूँ गर हारा तो बस खुदी से... !!!

मैं हूँ गर हारा तो बस खुदी से...
मैं हूँ गर बेसहारा तो बस खुदी से...

काठी को काया समझता रहा...
माटी को माया समझता रहा...
भीतर ही भीतर मैं फिरता रहा...
मैं हूँ गर बंजारा तो बस खुदी से...

मैं हूँ गर हारा तो बस खुदी से..
मैं हूँ गर बेसहारा तो बस खुदी से...

मैं तड़पता हूँ तो अपनी हर एक चाह में...
मैं डरता हूँ तो मन की हर अँधेरी गाह  में...
मैं बहकता हूँ तो तमन्नाओ की  राह में...
में हूँ गर आवारा तो बस खुदी से...

मैं हूँ गर हारा तो बस खुदी से..
मैं हूँ गर बेसहारा तो बस खुदी से...

मैं वो नहीं जो मैं मानता हूँ...
सच वो नहीं जो मैं जानता हूँ...
कुछ तो  है फिर जो मैं छानता हूँ...
मैं हूँ गर दूर जा रहा तो बस खुदी से...

मैं हूँ गर हारा तो बस खुदी से...
मैं हूँ गर बेसहारा तो बस खुदी से...

भावार्थ...

राधिका से जब ये नैना लागे रे... !!!

राधिका से जब ये नैना लागे रे...
कान्हा अब सारी-२ रैना जागे रे...

बिसुरी सुध और बंसी गुमाई...
बन बन फिरे होए जग में हंसाई...
बेकल जी अब ये चैना मांगे रे...
राधिका से जब ये नैना लागे रे...

राधिका से जब ये नैना लागे रे...
कान्हा अब सारी-२ रैना जागे रे...

माखन भूला और ग्वाले भुलाए...
भोली सुरतिया जी कैसे भुलाये...
काँटा पिरतिया का ये पैना लागे रे...
राधिका से जब ये नैना लागे रे...

राधिका से जब ये नैना लागे रे...
कान्हा अब सारी-२ रैना जागे रे...

भावार्थ...

Sunday, January 1, 2012

मिजाज़

मिजाज़ इस साल का कुछ ठीक नहीं लगता...
फूंस ऐसे बरस रहा है जैसे  सावन हो...
अलावों  में कोयले विभीषण निकले...
कोहरे में छिपा  जैसे बारिश का रावन हो...

भावार्थ...

जब लाद चलेगा बंजारा...

तू खिर्स-ओ-हवस को छोड़ मियाँ...
मत देश-प-देश फिरे मारा...
कजाक अज़ल का लूटे है...
दिन रात बजा कर नक्कारा...
क्या बधिया भैसा बैल सुतर....
क्या गोई पल्ला सर फारा...
क्या गेहूं चावल मोठ मटर...
क्या आग धुआं क्या अंगारा...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


गर तू है लख्खी बंजारा...
और खेप भी तेरी भारी है...
ए गाफिल तुह्झ्से भी चढ़ता...
एक और बड़ा व्यापारी है...
क्या शक्कर मिश्री कंद गिरी...
क्या साम्भर मीठा खारी है...
क्या दाख मुन्न्क्का सोठ मिर्च...
क्या केसर  लॉन्ग सुपारी है...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


ये बधिया लादे बैल भरे...
जो पूरब पश्चिम जावेगा...
या सूद बढ़ा के लावेगा...
या टोटा घाटा पावेगा...
कजाक अज़ल का रस्ते में...
जब भाला मार गिरावेगा..
धन दौलत नाती पोता क्या...
एक कुम्भा काम न आवेगा...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


हर मंजिल में अब साथ तेरे...
ये जिनिया डेरा डाला है..
जर दरम दीनार का भांडा है...
बन्दूक से पर और खांडा है...
जब नायक तन का निकल गया...
वो मुल्को मुकों बांडा है...
फिर हांडा है न भांडा है...
हलवा है न मांडा है...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


जब चलते चलते रस्ते में...
ये गौण तेरी ढल जायेगी...
एक बधिया तेरी मिटटी पे...
एक घास न चरने आवेगी...
ये खेप जो तुने लादी है...
सब हिस्सों में बाँट जावेगी...
धी पुत जमाई बेटा क्या....
बंजारन पास ना आवेगी...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


ये खेप भरे जो जाता है...
ये खेत मियाँ मत गिन अपनी...
ये कौन घडी किस हाल में...
ये खेप है बस खपनी...
क्या थाल कटोरे चांदी के..
क्या पीतल की डिबिया ढपनी..
क्या बर्तन सोने रोपये के...
क्या मिटटी की हंडिया चपनी...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...

जब लाद चलेगा बंजारा...


कुछ काम न आवेगा तेरे...
ये लाल जमूरत सीमो जर...
जब पूजी बात में बिखरेगी...
फिर आन बनेगी जान ऊपर...
नकारे नौबत बाण निशाँ...
दौलत हज्मत फौजे लश्कर...
क्या मशंत तकिया मिल्क मकान...
क्या चौकी कुर्सी तख़्त छप्पर...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


क्यों जी पर बोझ उठाता है...
इन गौनो भारी भारी के...
जब मौत का डेरा आन पडा...
फिर दुने हैं व्यापारी के...
क्या साज सजाओ जर जेवर...
क्या गोटे ठान किनारी के...
क्या गोदे जींद सुनहरी के...
क्या हाथी लाल अमारी के...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


मगरूर न हो तलवारों पर...
मत फूल भरोसे ढालों के...
सब पट्टा तोड़ के भागेंगे...
मूह देख अज़ल के भालों के...
क्या डब्बे मोती हीरों के...
क्या ढेर खाजाने  मालों के...
क्या बुक्चे ताश मुसज्जर के...
क्या तख्ते शाल दुशालों के...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...




क्या सख्त मकान बनवाता हैं...
ख़म तेरे बदन का है पोला...
तू ऊँचे कोट उठाता है...
वहां घोर घने ने मूह खोला...
क्या रैनी खंदक रंग बड़े...
क्या बुर्ज कंगोरा अनमोला...
गढ़ रोल अकल्ला तोप कला...
क्या शीशा दारू और गोला...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


हर आन नफे और टोटे में...
क्यों मरता फिरता है बन बन...
टुक काफ़िल दिल में सोच जरा...
साथ लगा तेरे दुश्मन....
क्या लौंडी बंदी दाई दवा...
क्या बंद चेअल नेक चलन...
क्या मंदिर मस्जिद ताल कुए...
क्या घाट चरा क्या बाग़ चमन...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...
जब लाद चलेगा बंजारा...


जब मर्द फिर के चाबुक को...
ये बैल बदन का हाकेंगा...
कोई नाज़ समेटेगा तेरा...
कोई गौण सिये और टान्केगा....
हो ढेर अकेला जंगल में...
तू ख़ाक लहद की फांकेगा...
उस जंगल में फिर आख नजीर..
एक फुन्गा आन न झांकेगा...


सब ठाठ पड़ा रह जावेगा...

जब लाद चलेगा बंजारा...




नजीर अकबराबादी !!!

नव-वर्ष को हार्दिक शुभकामनाएं !!!

गर दर्द-ए-आम  एक सवाल हो...
काश न ऐसा कोई साल हो...

हुकुमरान कैद में नज़र आयें...
बाशिंदे गैल पर नज़र आयें...
भ्रष्ट क़ुतुब पे तुलिका बजायें...
गर रोज इतना ही बवाल हो...
काश न ऐसा कोई साल हो...

कोई भूख अब असहनीय हो गयी...
क्यों दाल-सब्जी पकवान हो गयी...
क्यों हरित देश से हरियाली खो गयी...
गर आबादी का ऐसा हाल हो..
काश न ऐसा कोई साल हो...

क्यों बच्चे शिक्षा की कतारों में हैं...
शिक्षा बिहीन शिक्षित हजारों में है...
गुरुकुल का खाब बस किताबों में है...
गर भारत का कल बदहाल हो...
काश न ऐसा कोई साल हो...

विछिप्त नहीं हो तुम बस सोये हो...
कनक पे पीतल का पर्दा संजोये हो...
शक्ति भूल खुद की माया में खोये हो...
हर दिल में जुनूँ हाथ में मशाल हो...
काश आने वाला ऐसा हर साल हो...

बसखुद को बदलने का ख्याल हो..
काश आने वाला ऐसा हर साल हो...

भावार्थ
( नव-वर्ष को हार्दिक शुभकामनाएं)