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Wednesday, November 23, 2011

किसी का यु तो हुआ कौन हुआ

किसी का यु तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी...
ये हुस्न-ओ-इश्क तो धोखा है सब मगर फिर भी...

किसी का यु तो हुआ कौन हुआ उम्र भर फिर भी...

हज़ार बार जमाना इधर से गुज़ारा है...
नयी नयी सी है  कुछ देर इधर रहगुज़र फिर भी...

तेरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है...
उतर गया रग-ए-जाँ में ये निश्तर  फिर भी...

किसी का यु तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी...
ये हुस्न-ओ-इश्क तो धोखा है सब मगर फिर भी...

फ़िराक गोरखपुरी...

Tuesday, November 22, 2011

ये जो कौलो-करार है क्या है...

ये जो कौलो-करार है क्या है...
शक्ल है या एक वार है क्या है...

ये जो उठता है दिल में रह रह कर..
अब्र है या गुबार है क्या है...

जेर-इ-लब एक झलक तबस्सुम की...
बर्फ है या शरार है क्या है...

कोई दिल का मकाम समझाओ..
घर है या रहगुज़ार है क्या है...

फ़िराक गोरखपुरी !!!

फ़िराक गोरखपुरी

फिराक एक नयी सूरत निकल तो सकती है...
वो आँख कहती है दुनिया बदल तो सकती है...
कड़े हैं कोस बहुत मंजिल-ए- मोहब्बत के..
मिले न छाव मगर धुप ढल तो सकती है...
सुना है बर्फ के टुकड़े हैं दिल  हसीनों के...
कुछ आंच पा के चांदी पिघल तो सकती है...

फ़िराक गोरखपुरी !!!

अब अक्सर चुप चुप रहे हम...

अब अक्सर चुप चुप रहे हम...
यु ही कहो लब खोले हैं...

पहले फ़िराक को देखा होता....
अब तो अभूत कम बोले हैं...

दिन में गम को देखने वालो..
अपने अपने हारों का...

जाओ न तुम इन खुश्क आँखों पे...
हम रातों को रोले  हैं...

पहले फ़िराक को देखा होता....

अब तो अभूत कम बोले हैं...


गम का फ़साना सुनने वालो..
आखिर शब् आराम  करो...

कल ये कहानी  फिर छेड़ेंगे ...
हम भी जरा अब सो लेते हैं...

पहले फिराक देखा होता...
अब तो बहुत कम बोले हैं...


फ़िराक गोरखपुरी !!!