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Sunday, October 2, 2011

हमारे कुछ गुनाहों की सजा भी साथ चलती है..

हमारे कुछ गुनाहों की सजा भी साथ चलती है...
हम अब तनहा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है...
अभी जिन्दा है मेरी माँ मुझे कुछ भी नहीं होगा...
जब घर से निकलता हूँ  दुआ भी साथ चलती है...


ये सेहरा  है मियां यहाँ  चालाकी नहीं चलती...
यहाँ मजनू की चल जाती है लैला की नहीं चलती...
टीम यहाँ न ढूढों  कोई लंगड़ा आदमी ...
जहाँ खुद्गार्गी होती है वहां बैसाखी नहीं चलती...

अजब दुनिया है ना-शायर  यहाँ देखो सर उठाते हैं ...
और जो शायर है वो महफ़िल में दरिया उठाते हैं...
तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कान्धा नहीं देते...
हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं...

इस तिलिस्म में जो हरा था वो सूखा निकला...
उसकी खिदमत में हर अंदाज़ ही रुखा निकला...
एक निवाले के लिए जिसे मैंने मार दिया...
वोह परिंदा भी कई रोज का भूखा निकला...

मौला ये तमन्ना है जब मैं जान से जाऊं...
जिस शान से आया हूँ उसी शान से जाऊं...

बच्चो की तरह पेड़ की शाखों से कूदूं..
परिंदों की तरह उड़ता खिलायाँ से जाऊं...

हर शब्द महके लिखा हुआ मेरा...
मैं लिपटा हुआ यादो की लोबान से जाऊं...

माँ जिन्दा देखेगी तो चीख पड़ेगी...
पीठ में झकम लिए कैसे मैदान से जाऊं...

खिले हुए फूल का क्या भरोसा..
न जाने कब इस गुल दान से जाऊं...



मुन्नवर राणा