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Thursday, December 8, 2011

प्यार कभी इकतरफा होता है न होगा...

प्यार कभी इकतरफा होता है न होगा...
दो रूहों के एक मिलन की जुड़वां पैदाईश है ये ...
प्यार अकेला जी नहीं सकता...
ये जीता है तो दो में ...
मरता है तो दो मरते हैं...
प्यार एक बहता दरिया है...
झील नहीं है जिसको दो किनारे बाँध के बैठे रहते हैं...
सागर नहीं है किसका किनारा नहीं होता...
बस दरिया है जो बहता रहता है...
दरिया जैसे चढ़ जाता है ढल जाता है...
चलना ढलना प्यार में वो सब होता है...

पानी की आदत है ऊपर से नीचे की जानिब बहना...
नीचे से फिर  भाग के सूरत ऊपर उठना...
बादल बन आकाश में बहना...
कापने लगता है जब तेज हवाएं छेड़ें...
बूँद बूँद सा फिर बरस जाता है...

प्यार एक जिस्म के साज पे बजती गूँज नहीं है
न मंदिर की आरती है न पूजा है...
प्यार नफा है न लालच है...
न लाभ न हानि कोई...

गुलज़ार

Thursday, November 24, 2011

नज़्म उलझी हुई है सीने में...

नज़्म उलझी हुई है सीने में...


मिसरे अटके हुए है होंठो पर...

उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह...

लफ्ज़ कागज़ पे बैठते ही नहीं...

कब से बैठा हुआ हूँ में जानम...

सादा कागज़ पे लिख के नाम तेरा...

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है...

इस से बेहतर भी नज़्म क्या होगी?

गुलज़ार  !!!



Wednesday, June 10, 2009

अलाव...गुलज़ार

रात भर सर्द हवा चलती रही।
रात भर हमने अलाव तापा।
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखिएँ काटी।
तुमने भी गुजरे हुए लम्हों के पत्ते तोडे।
मैंने जेबों से निकाली सभी सुखी नज्मे।
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुए ख़त खोले।
अपने इन आंखों से मैंने कई मांजे तोडे।
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी तुमने।
पलकों पे नमी सूख गयी थी, सो गिरा दी।
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको।
काट के दाल दिया जलते अलावों मैं उसे।
रात भर फूंकों से हर लौ को जगाये रखा।
और दो जिस्मों के इंधन को जलाये रखा।
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हुमने।

गुलज़ार...

Wednesday, February 18, 2009

कितनी गिरहें खोली हैं मैंने .!!!

कितनी गिरहें खोली हैं मैंने ...
कितनी गिरहें अब बाकी हैं...

पाओं में पायल बाहों में कंगन...
गले में हंसरी ,कमर बंद, छल्ले और बिछुए...
नाक कान छिदवाए गए...
और जेवर जेवर कहते कहते ....
रीत रिवाज की रस्सियों से मैं जकड़ी गई...
उफ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गई...

अब छिलने लगे हैं हाथ पाओं...
और कितनी खराशे उभरी हैं...
कितनी गिरहें खोली हैं मैंने...
और कितनी रस्सियाँ उतरी हैं...


अंग अंग मेरा रूप रंग...
मेरे नैन नक्श मेरे भोले पैर...
मेरी आवाज़ मैं कोयल की तारीफ हुई...
मेरी जुल्फ सौंप जुल्फ रात...
मेरी जुल्फ घटा मेरे लब गुलाब...
आँखें शराब....
ग़ज़ल नज़्म कहते कहते...
मैं हुस्न और इश्क के अफसानो में जकड़ी गई...
कितनी तरह मैं पकड़ी गई...

मैं पूंछूं जरा मैं पूछूं जरा...
आँखों मैं शराब दिखी सबको...
आकाश नही देखा कोई...
सावन भादों तो दिखे मगर...
क्या दर्द नहीं देखा कोई...


फेन की छैनी से बुत छीले गए...
तागा तागा करते करते पोशाक उतारी गई॥
मेरे जिस्म में फन की मस्क हुई...
आर्ट कला कहते कहते मैं संगे मर्मर मैं जकड़ी गई...
उफ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गई...

बतलाये कोई बतलाये कोई...


गुलजार ...

Monday, November 3, 2008

सुरमई अखियों में !!!

सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा...२
निंदिया के उड़ते पाती रे...
अखियों मै आज साथी रे...
रारी रा रूम ओ रारी रूम....२

सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा...२
रारी रा रूम ओ रारी रूम....२

सच्चा
कोई सपना देजा ...
मुझको कोई अपना देजा...
अंजना सा मगर कुछ पहचाना सा...
हलक फुल्का शबनमी...
रेशम से भी रेशमी...

सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा...२
रारी रा रूम ओ रारी रूम....२

रात
के रथ पे जाने वाले...
नींद का रस बरसाने वाले...
इतना केर दे की मेरी आँखे भर दे॥
आखों मैं बसता रहे...
सपना ये हँसता रहे...

सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा...२
रारी रा रूम ओ रारी रूम....२

गुलज़ार
...

Sunday, October 26, 2008

दिल हूम हूम करे...

दिल हूम हूम करे घबराए...
घन धम धम करे गरजाए...
एक बूँद कभी पानी की ...
मोरी अंखियों से बरसाए...

दिल हूम हूम करे...

तेरी झोरी डरूं...
सब सूखे पात जो आए
तेरा छुआ लागे...
मेरी सूखी डार भर आए

दिल हूम हूम करे...

जिस तन को छुआ तुने...
उस तन को छुपाऊँ...
जिस मन को लागे नैना...
वोह किसकी दिखाऊँ

मेरे चंद्रमा
तेरी चांदनी आग लगाये
तेरी ऊंची अटारी...
मैने पंख लिए कटवाय....

दिल हूम हूम करे॥

गुलज़ार...

Saturday, October 25, 2008

बीती न बीते न रैना...गुलजार !!!

बीती न बीते न रैना...
कोरे हैं नींद से नैना...
नैनो के सपने भिगोके...
आए तो बोले न बैना...

बीते न बीते न रैना -२

रातो के पन्नो पे न कोई कारा...
न कोई संगी न कोई बाती..
आंगनमें उतरे न सुबह के पाखी...
न कोई सजन न कोई साथी...

बीते न बीते न रैना...3

तारो में उड़ती हैं पागल हवाएं...
मरू अकेले न जाना ...
बादल के टीले पे उगते बबूल
टीले पे घर न बनाना...

बीते न बीते न रैना...4


गुलजार...

Monday, September 29, 2008

बोल हलके बोल हलके !!!...गुलज़ार

धागे तोड़ लाओ चांदनी से नूर के।।
घूंघट बना लो रौशनी से नूर के।
शर्मा गई तो आगोश में लो।
साँसों से उलझी रहीं मेरी साँसे।
बोल हलके बोल हलके।
होठ से मेरे हलके, बोल हलके।

आ नींद का सौदा करें।
एक खाब ले और एक खाब दे।
एक खाब तो आँखों में है।
एक चाँद के तकिये तले।
कितने दिनों से यह असमान सोया नही है।
चलो इसको सुला दे।
बोल हलके बोल हलके।
होठ से हलके बोल हलके।

उम्रें लगी
कहते हुए।
दो लफ्ज़ थे एक बात थी।
वो एक दिन सौ साल का।
सौ साल की वो एक रात थी।
कैसा लगे चुपके दोनों।
पल में सदियाँ बिता दे।
बोल हलकर बोल हलके।
होठ से हलके बोल हलके।

धागे तोड़ लाओ चांदनी से नूर के।।
घूंघट बना लो रौशनी से नूर के।
शर्मा गई तो आगोश में लो।
साँसों से उलझी रहीं मेरी साँसे।
बोल हलके बोल हलके।
होठ से मेरे हलके, बोल हलके।

गुलज़ार