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Saturday, April 7, 2012

और चाहिए फ़राज़ तुझे कितनी मोहब्बतें...

उसने सुकूत-इ-शब् में भी अपना पयाम रख दिया...
हिज्र की रात बाम पर माह-ए-तमाम रख दिया...

आमद-ए-दोस्त की भी कूए वफ़ा में आम थी...
मैंने भी  भी चराग सा दिल सरे-ए-शाम रख दिया...

शिद्दत-ए-त्रिष्णगी में भी गैरत-ए-मयकशी रही...
उसने जो फेर ली नज़र मैंने भी जाम रख दिया...

देखो ये मेरे खाब थे देखो ये मेरे जख्म है..
मैंने तो सब हिसाब-ए-जाँ बस सरेआम रख दिया...

उसने नज़र नज़र में ही ऐसे भले सुखन कहे...
मैंने तो उसके पाँव में सारा कलाम रख दिया...

और चाहिए फ़राज़ तुझे कितनी मोहब्बतें...
माओं ने तीरे नाम पे बच्चों का नाम रख दिया...


अहमद फ़राज़ !!!

Monday, December 5, 2011

जिंदगी से यही गिला है मुझे !!!

जिंदगी से यही गिला है मुझे...
कि तू बड़ी देर से मिला है मुझे...
हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं...
एक मुसाफिर ही काफिला है मुझे...
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल...
हार जाने का हौसला है मुझे...

अहमद फ़राज़ !!!

मैं क्या दो रोज का मेहमान तेरे शहर में था ...

मैं क्या दो रोज का मेहमान तेरे शहर में था ...
अब चला हूँ तो कोई फैसल कर भी न सकूं...
जिंदगी की ये घडी टूटता पुल हो जैसे...
ठहर भी न सकूं और गुज़र भी न सकूं...

अहमद फ़राज़ !!!

Saturday, December 3, 2011

अहमद फ़राज़

अगरचे जोर हवाओं ने दाल रखा है...
मगर चराग ने लौ को संभाल रखा है...

भले दिनों का भरोसा क्या रहें न रहें...
सो मैंने रिश्ते-ए-गम को बहल रखा है...

हम ऐसे सादा दिलो को वो  दोस्त हों या खुदा...
सबने वादा-ए-पर्दा दाल रखा है..

फिजा में नशा ही नशा हवा में  रंग ही रंग...
ये किसने अपना पैराहन उछाल रखा है...

फ़राज़ इश्क की दुनिया तो खुबसूरत थी...
ये किसने फितना-इ- हिज्र-ओ-विसाल रखा है...


वहसते बढती गयीं हिज्र के आजार के साथ...
अब तो हम बात भी करते नहीं गम खार के साथ...

इसकदर खौफ है इस शहर की गलियों में की लोग...
चाक सुनते हैं तो लग जाते हैं दीवार के साथ...

हमको उस शहर में तामीर का सौदा है जाना...
जो दीवार में चुन देते हैं मेमार के साथ...

अहमद फ़राज़...

Thursday, December 1, 2011

तुम हो !!!

जिस सिम्त भी देखूं नज़र आता है कि तुम हो...
ना जाने यहाँ कोई तुम सा  है कि तुम ही...

ये खाब है खुशबू है कि झोंका है कि पल है...
ये धुंध है बादल है कि साया है कि तुम हो...

देखो ये किसी और की आँखें है कि मेरी...
देखूं ये किसी और का चेहरा है कि तुम हो...

ये उम्र-ए-गुरेजा है कहीं ठहरे तो ये जानू...
हर सांस में मुझे  लगता है कि तुम हो..

एक दर्द का फैला हुआ सेहरा है कि में हूँ...
एक मौज में आया हुआ दरिया हूँ कि तुम हो...

ए जाने फ़राज़ इतनी भी तौफिक  किसे थी..
हमको गम-ए-हस्ती भी गवारा कि तुम हो...

अहमद फ़राज़ !!!

Wednesday, November 30, 2011

जालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जायेगा...

आंख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा..
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा...

डूबते डूबते क्षित को उछाल अड़े दूं..
में न अहिं तो कोई तो साहिल पे उतर जाएगा...

जिंदगी तेरी अत है तो हए जाने वाला..
तेरी बक्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा...

जब्त लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़...
जालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जायेगा...

अहमद फ़राज़ !!!


Sunday, February 1, 2009

कुछ शेर !!! अहमद फ़राज़ ...

इससे पहले की बेवफा हो जाएँ...
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जायें...
तू भी हीरे से बन गया पत्थर...
हम भी कल क्या से क्या हो जाएँ...

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है...
की फूल अपने कबायें क़तर के देखते हैं...
रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ करती हैं...
चले तो उसको जमाने ठहर के देखते हैं...

अहमद फ़राज़...