Showing posts with label मंजर भोपाली. Show all posts
Showing posts with label मंजर भोपाली. Show all posts

Thursday, February 5, 2009

मंजर भोपाली !!!

आप से नहीं बिछडे जिंदगी से बिछडे है...
हम चिराग अपनी रौशनी से बिछडे हैं....
इससे ज्यादा क्या होगा साम्या मुकद्दर की...
जिससे भी मोहब्बत की हम उसीसे बिछडे हैं....
-------------------------------------------
सितमगरों का है फरमान की घर भी जायेगा...
अगर झूठ न बोला तो सर भी जायेगा...
बनाईये न किसी के लिए भी ताजमहल...
हुनर दिखाया यो दश्ते-हुनर भी जायेगा
माएं चलती है बच्चो के पाव से जैसे...
उधर ही जायेंगी बच्चा जिधर भी जायेगा....
--------------------------------------------
तुम्हारी बात कहाँ घाव भरने वाली है...
यही कटार तो दिल में उतरने वाली हैं...
वोह जा रहे हैं तो महसूस हो रहा है मुझे...
की रेल मुझे कुचल कर गुजरने वाली हैं...
हमारी टीवी फ़िल्म ये बता रहे हैं हमें...
हमारी मुल्क की तहजीब मरने वाली है...
ख़ुद ही सुधर जाईये तो बेहतर है...
न समझई की दुनिया सुधरने वाली है...
---------------------------------------------
मंजर भोपाली...

Friday, January 9, 2009

मंजर भोपाली ३ !!!

सितम करोगे सितम करेंगे ...
करम करोग करम करेंगे...
हमारी नीयत है तुम्हारी जैसी...
जो तुम करोगे वो हम करेंगे...

चलाये खंजर तो घाव देंगे...
बनोगे शोला अलाव दोगे...
हमें डुबोने की मत सोचना...
तुम्हे भी कागज़ की नाव देंगे...
कलम करोगे तो कलम करेंगे...
जो तुम करोगे वोह हम करेंगे...

तुम उठते हाथो को काट डालो...
की शहर लाशोसे से पात डालो...
फ़िर अगला मौसम हमारा होगा...
चमन का सरदा भी छांट डालो...
हम भी इससे न कम करेंगे...
जो तुम करोगे वो हम करेंगे...

गुलाब दोगे गुलाब देंगे...
मोहाबतो का जवाब दोगे...
खुशी का मौसम जो हमको देंगे...
तुम्हे गुलो की किताब देंगे ...
कभी सर को न कलम करेंगे ...

वो देखो जालिम की हार देखो...
ख़ुद की लाठी की मार देखो...
परो को सबके जो काटता है
समय की खंजर की धार देखो....
चलो जश्न अब हम करेंगे ...
जो तुम करोगे वो हम करेंगे...

हवाओ को अब लगाम देलो...
सुनो न चिंगारियों से खेलो...
मिली जो राई बनेगी पर्वत...
जरा हकीकत से काम लेलो...
सितम की बदले सितम करेंगे...
जो तुम करोगे वोह हम करेंगे...

अभी मकबर है रौशनी की
यऐ आस बाकी है जिंदगी की
अगर बुझाया अलाव तुमने...
न होगी एक बूँद रौशनी की...
चिराग कुछ हम भी कम करेंगे...
सितम करोगे सितम करेंगे....
जो तुम करोगे वो हम करेंगे...

न्याय तुमको पुकारता है...
सुनो जो तुममें उदारता है...
हमेशा जीती है आदमियत....
जो जुल्म करता है हारता है...
सितम का सर हम कलम करेंगे...
जो तुम करोगे वोह हम करेंगे...

मंजर भोपाली...

Thursday, January 8, 2009

मंजर भोपाली !!!

डर बदर भटकना क्या दफ्तर के जंगल में...
बेलचे उठा लेना डिग्रियां जला देना...

मौत से जो डर जाओ जिंदगी नहीं मिलती...
जंग जीतना चाहो कश्तियाँ जला देना...

फ़िर बहु जलने का हक़ तुम्हें पहुँचता है...
पहले अपने आँगन में बेटियाँ जला देना...

------------------------------------------------

अब अगर अस्मत-ऐ-किरदार ये भी गिर जायेंगी...
आपके सर से यह दस्तार भी गिर जायेगी...

बहते हुए दारे तो पहाडो का जिगर चीरते हैं...
हौसला कीजे ये दीवार भी गिर जायेगी...

हम से होंगे न लहू सीचने वाले जिस दिन....
देखना कीमते -गुलज़ार भी गिर जायेगी...

सफरोशी का जूनून आपमें जागा जिस दिन...
जुल्म के हाथ से तलवार भी गिर जायेगी...

रेशमी लाब्जो में कातिल से न बातें कीजे...
वरना शान-ऐ-गुफ्तार भी गिर जायेगी...

अपने पुरखो की विरासत को संभालो वरना...
अबकी बारिश में यह दीवार भी गिर जायेगी...

हमने यह बातें बुजुर्गों से सुनी है मंजर...
जुल्म धाएगी तो सरकार भी गिर जायेगी...
-------------------------------------------
वतन नसीब कहाँ अपनी कीमते होंगी...
जहाँ भी जायंगे हम साथ हिजरतें होंगी...

अभी तो कैद हैं जज्बों की आंधियां दिल में...
हमारा सब्र जो तोडा तो कयामतें होंगी...

-----------------------------------------------

हमने उन्हें सीधा कभी चलते नहीं देखा...
फितरत को सपोलो की बदलते नहीं देखा....

पढ़ते हैं मजे लेकर फसादों की वो खबरे...
घर जिन्होंने कभी अपना जलते हुए नहीं देखा...

------------------------------------------------

मंजर भोपाली...

रंग रंग के सांप हमारी दिल्ली में !!!

रंग रंग के सांप हमारी दिल्ली में...
मिलेंगे जेहर के व्यापारी दिल्ली में....

कैसे कैसे लोग हमारी दिल्ली में...
अटल बिहारी और बुखारी दिल्ली में...
रंग रंग...

तारीको के सारे बरस बताते हैं...
जो आते हैं लूटने वाले आते हैं...
अपनी इस तकदीर की मारी दिल्ली में...
रंग रंग के....

नाग बसे हैं संसद के गलियारों में....
डसने वाले छुपे हुए हैं यारो में...
खतरा बन गई यार की यारी दिल्ली में...
तंग रंग के सांप...

हमें नचाये बीन बजा के धर्मो की...
खून से लिखे पोथी काले कर्मो की...
बैठे हैं नफरत के पुजारी दिल्ली में...
रंग रंग ....

महंगाई ने छु ही लिया आकाश को...
कैसे ढोते जीवन की इस लाश को....
हो गई हर तरकारी महंगी दिल्ली में ...
रंग रंग....

भाषाओँ शूऊ में हमको बाँट कर...
छोटी कर दी प्यार की चादर छांट कर...
एक से बढ़ कर एक मदारी दिल्ली में...
रंग रंग के सांप हमारी दिल्ली में...
बैठे हैं जेहर के व्यापारी दिल्ली में...