फुर्सत !!!
अपनी मसरूफियत से कुछ पल चुरा के...
मैं बना रही हूँ फुर्सत....
आसान नही है ये...
इसमे जगह पाने...
बीते सालों की कितनी बातें ...
मेरे सामने चक्कर लगा रही हैं...
याद है...तुम्हारी वो घड़ी जो...
मेरे पास रह गई थी...
फुर्सत में उसकी टिक टिक...
हाय !!परेशान कर दिया है...
वक्त का एहसास ही तो भूलना था कैसे भूलूं ?...
और अब ये किताब के पन्ने...
उड़ उड़ के वहीँआ जाते हैं ...
जहाँ तुम्हारा नाम लिखा है ...
कैसे वो पेन तुम अपने होंठो में दबाये रखते थे ...
नीले पड़ जाते थे होंठ...
मैंने जिस रुमाल से पोंछा था ...
आज तक नही धो पायी तुम्हारी खुशबू ...
सामने खड़ा आइना जिसमें कभी...
मेरी -तुम्हारी...
मतलब हमारी तस्वीर साथ थी....
इस आईने का पानी आंखों में उतर रहा है ...
अब तो ये भी तंग कर रहा है...
और ....याद है
वो पानी जिसके किनारे पे ...
हम डूब गए थे..........
और ये नोटजो तुम्हारी जेब से चुराए थे कभी...
अब इनकी कीमत कुछ बढ़ गई होगी शायद...
ऐ फ़ोन कमबख्त
जब भी बजता हैलगता है..............
हम घंटो बातें करते थे न...
क्या कहते थे???अब तो कुछ भी याद नही ....
जम्हाई लेती हूँ तो...
लगता है तुमने मुहपे हाथ रख दिया हो...
"अरे बस ना कल शायद सोयी नही"...
"मेरे बारे में सोच रही थी न ...
"तब मैंने "ना "कहा था ...
झूठ कहा था ...
मेरे ये हाथ कितनी बार थामे थे ...
टेढी मेढी लकीरें बनाने के बहाने ...
मैं भी अनजान सी बन जाती थी ...
और अब देखो इन लकीरों में ...
तुम्हारा नाम नही ...
काश तब अपने नाम की ...
एक लकीर भी बना देते...
मैं कुरेद कुरेद केहरा रखती...
पर मिटने न देती ...
और क्या मैं और मेरा ...
सब कुछ क्या क्या कहूँ ...
हाँ लगता है मुझे कभी ...
फुर्सत नही दोगे तुम.....
शमा...
एहसासों के कारवां कुछ अल्फाजो पे सिमेटने चला हूँ। हर दर्द, हर खुशी, हर खाब को कुछ हर्फ़ में बदलने चला हूँ। न जाने कौन सी हसरत है इस मुन्तजिर भावार्थ को।अनकहे अनगिनत अरमानो को अपनी कलम से लिखने चला हूँ.....
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Sunday, November 2, 2008
Wednesday, October 8, 2008
तेजाब !!!

अब हर जगह तो तुम हो मेरे
अंदर भी बाहर भी
मेरे कद के साथ बढ़ते रहते हो,
नसों में खून की तरह चढ़ते उतरते
रहते हो,
आंखों की काली पुतलियाँ,
और सफ़ेद हिस्सा भी तुम हो
तभी कुछ और देख नही पाती,
दिल ओ दिमाग का हर एक
दिल ओ दिमाग का हर एक
किस्सा भी तुम हो,
मेरे होंठो की पूरी लम्बाई तुम्ही हो,
माथे की शिकन
हाथों में लकीरें भी
मेरे अंधेरे की रौशनी की
गहराई भी तुम्ही हो,
ऐसा करती हूँ में की ज़माना शायद
खुश हो जाए फिर
की ख़ुद से तुमको उतार देती हूँ
या फिर चलो ख़ुद को ही मार देती हूँ
उससे पहले में जिस्म के अंदर बाहर
तेजाब डाले दूंगी,
हो सकता है फिर मेरी आंखों में ,
रगों में ,लहू में -दिलो दिमाग जो
तुम हो और तुम्ही तुम हो
वो जल जाओ,पिघल जाओ,
और बन के धुआं उड़ जाओ
मुझमें से से निकल जाओ,
मैं सबकी खुशी और अपने सकूं को
ये भी कर जाउंगी
लेकिन बस एक बात का डर है
की शायद ही तेजाब का
रूह पे कोई असर है.
राधे ...
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