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Friday, December 19, 2008

लज्ज़त-ऐ-गम बढ़ा दीजिये...

लज्ज़त-ऐ-गम बढ़ा दीजिये...
आप यू मुस्कुरा दीजिये...
कीमत-ऐ-दिल बता दीजिये...
ख़ाक ले कर उड़ा दीजिये...
आप अंधेरे में कब तक रहे...
फ़िर कोई घर जला दीजिये...
चाँद कब तक गहन में रहे...
आप जुल्फें हटा दीजिये...
मेरा दामन बहुत साफ़ है...
कोई तोहमत लगा दीजिये...
एक समन्दर ने आवाज दी...
मुझको पानी पिला दीजिये...
लज्ज़त-ऐ-गम बढ़ा दीजिये...
आप यू मुस्कुरा दीजिये...

मुन्नी बेगम...








Tuesday, December 16, 2008

भूलने वाले से कोई कह दे जरा...

भूलने वाले से कोई कह दे जरा...
इस तरह याद आने से क्या फायदा ...

चार तिनके जला के क्या मिल गया...
मिट न सके जहाँ से मेरे निशाँ...
मुझपे बिजलियाँ गिराओ तो सही...
आशियाने पे गिराने से क्या फायदा...

पहले दिल को बुरे से कर पाक तुम...
फ़िर कुलु सी यकिदत से कर जुस्तजू...
ऐसे सजदे से अल्लाह मिलता नहीं...
हर जगह सर झुकने से क्या फायदा...

तुमन मूसा को नाहक तकलीफ दी...
लुफ्त आता अगर याद करती हुई...
जिनकी आँखों ने ताबे नजारा न हो...
उनको जलवा दिखने से क्या फायदा...

मुन्नी बेगम...