एहसासों के कारवां कुछ अल्फाजो पे सिमेटने चला हूँ। हर दर्द, हर खुशी, हर खाब को कुछ हर्फ़ में बदलने चला हूँ। न जाने कौन सी हसरत है इस मुन्तजिर भावार्थ को।अनकहे अनगिनत अरमानो को अपनी कलम से लिखने चला हूँ.....
Sunday, October 2, 2011
Thursday, August 28, 2008
अपनी पहचान !!! राहत इन्दौरी..
बस्तियां छोड़ के जाने को कहा जाट है।
पत्तियां रोज गिरा जाती है ये हवा।
और हमें पेड़ लगाने मको कहा जाता है।
खून आँखों के चिराग में छुपा लो।
वरना तीरगी रुखसत नहीं होने वाली।
तलवार उठा लो मेरे साथ चलना है तो।
मुझसे बुजदिल की हिमायत नहीं होने वाली।
अबके जो फैसल होगा वो यहीं होगा।
हमसे दूसरी हिजरत नहीं होने वाली।
राहत इन्दौरी...
Wednesday, August 27, 2008
नजराना..राहत इन्दौरी
में आ गया हूँ बता इन्तेजाम क्या क्या है।
फ़कीर , शाह, कलंदर, इमाम क्या क्या है।
तुझे पता नहीं तेरा गुलाम क्या क्या है।
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नए सफर का नया इन्तेजाम कह देंगे।
हवा को धुप चिराग को शाम कह देंगे।
किसी से हाथ भी छुप के मिलायी।
वरना इसे भी मौलबी साहब हराम कह देंगे।
लू भी चलती थी तो वो वादे-सबा कहते थे।
पाँव फैलये अंधेर को जिया कहते थे।
उनका अंजाम तुझको याद नहीं शायद।
और भी लोग थे जो ख़ुद को खुदा कहते थे।
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सूरज,सितारे चाँद मेरे साथ में रहे।
जब तक तेरे हाथ मेरे हाथ में रहे।
साखो से टूट जाए वोह पत्ते नहीं हम।
आंधी से कोई कह दे औकात में रहे।
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कभी महक की तरह गुलो से उड़ते हैं।
कभी धुएँ की तरह पर्वतों से उड़ते हैं।
यह कैंचियाँ हमें क्या ख़ाक रोकेंगे।
हम पारो से नहीं हौसलों से उड़ते हैं।
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राहत इन्दौरी...
Tuesday, August 26, 2008
पेहेन के आते हैं..राहत इन्दौरी
कुलाह तोख से भारी पेहेन के आती है।
अमीर सेहर तेरी तरह कीमती पोषक।
मेरी गली में भिखारी पेहेन के आते हैं।
यही यकिक है शाही के ताज की जीनत।
जो उँगलियों में मदारी पेहेन के आते हैं।
इबादतों की हिफाज़त बझी उनके जिम्मे हैं।
जो मस्जिदों में सफारी पेहेन के आते हैं।
राहत इन्दौरी..
Monday, August 25, 2008
शेरो-शायरी: राहत इन्दोरी...
जो दे रहे हैं फल तुम्हे पके पकाए हुए।
वोह पेड़ मिले हैं तुम्हे लगे लगाये हुए।
जमीन ओढ़ के सोये हैं दुनिया में।
न जाने कितने सिकंदर थके थकाए हुए।
यह क्या जरूरी है की गज़ले ख़ुद लिखी जाए।
खरीद लायेंगे कपड़े सिले सिलाये हुए।
हमारे मुल्क में खादी की बरकते हैं मियां।
चुने चुनाए हुए हैं सारे छटे छटाये हुए।
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यह बर्फ रातें भी बन कर धुआं अब उड़ जाएँ।
एक लिहाफ ओदूं तो सर्दियाँ उद्जएं।,
बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पे।
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जायें।
रहे ख्याल की मंस्सोबे इश्क हैं हमलोग।
अगर जमीन से फूके तो आसमान उड़ जाए।
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यह दिल किसी फकीर की हुजरे से कम नहीं।
दुनिया यहीं लाकर छुपा देनी चाहिए।
बीमार को मरज की दवा देनी चाहिए।
में पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए।
अल्लाह बरकतो से नवाजेगा इश्क में।
है जितनी पूँजी लगा देनी चाहिए।
में फूल हूँ तो फूल को गुलदान हो नसीब।
अगर में आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए।
में ख़ाक हूँ तो ख़ाक से चौकियें मुझे।
में नींद हूँ तो जगा देनी चाहिए।
में ताज हूँ तो तो से पे सजाये लोग।
में ख़ाक हूँ तो ख़ाक उदा देनी चाहिए।
सज बात कौन हैं सो सच कह सके।
में कह रहा हूँ मुझे सजा देनी चाहिए।
सौदा यहीं पे होता है हिन्दुस्तान का।
संसद भवन में आग लगा देनी चाहिए।
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तुफानो से आख मिलाओ, सैलाबों पे वार करो।
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तेर के दरिया पार करो।
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राहत इन्दौरी...