Monday, February 25, 2008

ढलते दिन की खुशी मना रहे सारे !!!

आज ढलते दिन की खुशी मना रहे सारे।
ये शाम का मंजर और रात के सब नजारे।

लू का गुस्सा भी कम सा हुआ है आख़िर ।
ठंडी बयार में जैसे कहीं उड़ गए हो सारे।

थका हुआ दिन सो गया सांझ के आगोश में।
गम की खलिश को जैसे भूल गए हो सारे।

शाम का बुढापा भी आ ही गया आख़िर ।
दिन की जवानी के जैसे रंग ढल गए सारे।

रात हुई और रंगीन ख्वाब जाग गए नींद से।
चांदनी घुली और कहीं से तारे उग गए सारे।

आज ढलते दिन की खुशी मना रहे सारे।
ये शाम का मंजर और रात के सब नजारे।
भावार्थ ...

3 comments:

Anonymous said...

अच्छी रचना है, अच्छा लगा पढ़कर...

Ajay Kumar Singh said...

Your complimnets are welcome. May I know how do you find blogs ?

a_n_u_r_a_g said...

gulzaari lal 'fakeer' ki nayi rachna badhiya lagi :)