Friday, August 29, 2008

एक और साल एक लम्हा सा बन गया।

एक और साल एक लम्हा सा बन गया।
जिंदगी का कद थोड़ा सा और बढ़ गया।
कुछ ने याद किया तो कुछ मिले भी।
ये तैरती खुशी का बादल था बढ़ गया।

नया दोस्त अपनों से भी करीबी बन गया।
और पुराना दोस्त एक अजनबी बन गया।
जुड़ते बिखरते रिश्तो का नाम है जिंदगी।
अजीब सिलसिला सा एक और बन गया।

थोडी हसी और थोड़ा सा गम सवर गया।
बीते लम्हों का सच याद सा बन गया।
कुछ हासिल है और कुछ हासिल भी नहीं।
आगे ही बढ़ते जन एक आदत सा बन गया।

पल रहे सपनों का एक साल गुजर गया।
मुझसे जुड़े अपनों का एक साल गुजर गया।
छूट गई हर एक चीज़ मेरी एक साल पीछे।
एक और साल एक लम्हा सा बन गया।

भावार्थ...
...२९ अगस्त २००८



5 comments:

Anwar Qureshi said...

wah ..bahut khub likha hai aap ne ..badhai ..

No Mad Explorer.... said...

Thnx Anwar ji....

a_n_u_r_a_g said...

nice thoughts..so true. par critical opinion ye - "आगे बढ़ने का जज्बा आदत सा बन गया।" galat sa lag raha hai..

No Mad Explorer.... said...

Thanks for critical opinion...I hve changes that line to "aage badhte jana ek aadat sa ba n gaya"....Thnx..

sushma 'आहुति' said...

bhaut hi sacchi aur khubsurtat abhivaykti.....