Thursday, May 1, 2008

कोई खुदा को सोचे और कोई तो इस्लाम बचाए !!!

कोई तो दुआ करे और कोई तो मन्नत मांगे।
कोई तो रजा रखे और कोई तो जन्नत मांगे।

कोई तो सलत पढे कोई तो सर को झुकाए।
कोई तो इल्म गढे और कोई तो फूल चढाये।

कोई तो कुरान पढे और कोई तो रोजे खोले।
कोई तो खुदाई जपे कोई तो तसलीम बोले।

कोई तो हज को मक्का जाए कोई तो काबा देखे।
कोई तो तल्बिया बोले और कोई सफा-मरवा देखे।

कोई तो जिरह करे और कोई तो फतवा लाये।
कोई खुदा को सोचे और कोई तो इस्लाम बचाए।

भावार्थ...

तल्बिया: Prayer while devotee goes to मक्का

सफा-मरवा: Two small mountains in मक्का
इल्म: knowledge
सलत: prayer
तसलीम : Greeting after namaz

4 comments:

Suresh Gupta said...

कोई तो इस्लाम बचाए से आपका क्या तात्पर्य है? क्या इस्लाम खतरे में है? मेरा यह मानना है कि धर्म कभी खतरे में नहीं होता. धर्म तो लोगों को निर्भय बनाता है, उन्हें ताकत देता है. उन्हें हर तरह के खतरों से बचाता है. उन्हें खुदा तक पहुँचनें का रास्ता दिखाता है.

राजीव रंजन प्रसाद said...

विरोधाभासों को सुन्दरता से प्रस्तुत किया है आपने...

***राजीव रंजन प्रसाद

Ajay Kumar Singh said...

Dear Suresh ji...thanks for your comments....I ahve written this, to awaken those muslism are adopting western culture and forgetign the true ethos of Islam....thanks for writing...

Ajay Kumar Singh said...

Dear Rajiv ji....thanks !!!