Wednesday, April 30, 2008

पपीहा क्या अब तो इंसा भी जीने को तरसेंगे !!!

इस दौर के ठहरे बादल न जाने कैसे बरसेंगे।
पपीहा क्या अब तो इंसा भी जीने को तरसेंगे।

उजियाला दिन छोटा और काली रात बड़ी होगी।
डरी जिंदगी भी बेखौफ मौत के साथ खड़ी होगी।

हुनर के अरमान बीच बाज़ार बिकने को बिखरेंगे।
पपीहा क्या अब तो इंसा भी जीने को तरसेंगे।

खोखले लोग, सोच खोखली , खोखली बातें सारी।
दस्तूर दौर यही होगा रोएगी खोखल दुनिया सारी।

सच का बोझ उठाते उठाते रूह भी एक दिन रोदेगी।
ये झूट की शौहरत आने वाली पीड़ी का रुख मोडेगी।

उसूल के अश्क भी सावन भादो इस तरह से बरसेंगे।
पपीहा क्या अब तो इंसा भी जीने को तरसेंगे।

इस दौर के ठहरे बादल न जाने कैसे बरसेंगे।
पपीहा क्या अब तो इंसा भी जीने को तरसेंगे।

भावार्थ...

Tuesday, April 29, 2008

और मेरा अक्स मौत की बाँहों में था......!!!

उसने बेवफा क्या कहा मुझसे।
में अपनी वाफाओ पे रोने लगा।
तान्हे आ आ कर चुभने लगे।
मेरा मिजाज ख़ुद बिगड़ने लगा।
उसकी नजरो में जो देखा मैंने।
अपने आप को संभल न पाया।
लोगो को क्या समझाऊं।
क्यों में मरासिम बना न पाया।
मजबूरियां जहर उगलने लगी।
मेरी साँसे भी फिर उखड़ने लगी।
में उसे ज्यों ही भूलने लगा।
उसकी यादो का दर्द बढ़ने लगा।
मैंने उसके चेहरे से ज्यों रुख मोडा।
मेरा वजूद ने मेरा साथ छोडा।
उसका अक्स मेरी आंखो में था।
और मेरा अक्स मौत की बाँहों में था...

भावार्थ
...