दुनिया के बेढंगे रिश्तो के तले...
मेरे कितने ही हैं अरमान जले...
कुतरी शख्शियत के लत्ते लिए ...
बुझा दिए मैंने परवाज़ के दिए...
छिल दिए सपने जो थे बुन रहे...
तोड़ दिए मूरत की किनोरे बन रहे...
अब बचा है बस गमो का पुलिंदा ...
मौत को ओढे एक शख्श जिन्दा...
रिस्तो में उलझा सा वजूद लिए ...
खामोश साँस का सिलसिला जिए...
पाक रिश्तो की नीयत है बिगड़ रही...
घुटन लहू, रगों, साँसों तक है बढ़ रही...
अब सुकून बेताब आगोश को है कहाँ...
रिश्ते को मेरी प्यास का अंदाज़ है कहाँ...
नापाक रिश्तो की पनाह में हूँ बढ़ रही ...
तड़प बढ़ रही है या फ़िर में हूँ बढ़ रही ...
भावार्थ...
एहसासों के कारवां कुछ अल्फाजो पे सिमेटने चला हूँ। हर दर्द, हर खुशी, हर खाब को कुछ हर्फ़ में बदलने चला हूँ। न जाने कौन सी हसरत है इस मुन्तजिर भावार्थ को।अनकहे अनगिनत अरमानो को अपनी कलम से लिखने चला हूँ.....
Saturday, May 2, 2009
कालिख !!!
कालिख है ये !!!
जो अब तक है लगी हुई....
मेरे इरादों में है बसी हुई...
नसों में लहू सी दौड़ती...
मेरे हौंसले को मरोड़ती...
कालिख है ये !!!
लोग अपने भी कतराने लगे...
बुझे चिराग नज़र आने लगे...
आंधियां जेहेन में मचलने लगी...
धुप भी छाँव के साए से निकलने लगी...
कालिख है ये !!!
जो अब तक छुटाए नहीं छूटती...
दाग की लकीर अब नहीं टूटती...
मेरे दामन पे उँगलियाँ अब उठ चुकी है...
खुशियाँ जो थी सब रूठ चुकी हैं...
कालिख है ये !!!
भावार्थ...
जो अब तक है लगी हुई....
मेरे इरादों में है बसी हुई...
नसों में लहू सी दौड़ती...
मेरे हौंसले को मरोड़ती...
कालिख है ये !!!
लोग अपने भी कतराने लगे...
बुझे चिराग नज़र आने लगे...
आंधियां जेहेन में मचलने लगी...
धुप भी छाँव के साए से निकलने लगी...
कालिख है ये !!!
जो अब तक छुटाए नहीं छूटती...
दाग की लकीर अब नहीं टूटती...
मेरे दामन पे उँगलियाँ अब उठ चुकी है...
खुशियाँ जो थी सब रूठ चुकी हैं...
कालिख है ये !!!
भावार्थ...
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