अच्च्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं ...
राम नारायणं जानकी वल्लभं...
कौन कहता है भगवान आते नहीं...
तुम मीरा के जैसे बुलाते नहीं...
अच्च्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं ...
राम नारायणं जानकी वल्लभं...
कौन कहता है भगवान् सोते नहीं...
माँ यशोदा के जैसे सुलाते नहीं...
अच्च्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं ...
राम नारायणं जानकी वल्लभं...
कौन कहता है भगवान् खाते नहीं...
बेर शबरी के जैसे खिलाते नहीं...
अच्च्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं ...
राम नारायणं जानकी वल्लभं...
कौन कहता है भगवान् नाचते नहीं...
तुम गोपियों के जैसे नचाते नहीं...
अच्च्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं ...
राम नारायणं जानकी वल्लभं...
....भजन
एहसासों के कारवां कुछ अल्फाजो पे सिमेटने चला हूँ। हर दर्द, हर खुशी, हर खाब को कुछ हर्फ़ में बदलने चला हूँ। न जाने कौन सी हसरत है इस मुन्तजिर भावार्थ को।अनकहे अनगिनत अरमानो को अपनी कलम से लिखने चला हूँ.....
Friday, June 11, 2010
Friday, June 4, 2010
उडती लकीरें !!!

रेगिस्तान ने आसाम की तरफ देखा...
तो बादलों पे रेत जम गयी...
हवा के दांत किर-किरे हो गए...
तारों को कुछ दिखाई नहीं देता...
सूरज चाँद सा फीका नज़र आता है...
मगर ये जो लकीरें सी उडती नज़र आती है...
ये क्या हैं...?
कहीं सरहद तो नहीं उड़ आई कहीं...
तपते धधकते रेत के साथ ...
साल बीत गए मगर बंटवारे की लकीर...
उतनी की उतनी ही गहरी रही...
रेत उड़ता रहा इनके इर्द गिद ...
पर बिलकुल बेअसर जहर की तरह...
शायद ये तूफ़ान ही मिटा दे इन लकीरों को ....
जमी से मिटा कर न सही ...
हवा में उड़ा कर ही सही ...
...भावार्थ
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