सुख के किनारे, गम के ये धारे....
सुख के किनारे, गम के ये धारे....
चली जा रही नदिया किसके सहारे....
सुख के किनारे ,गम के ये धारे...
शम्मा रात की बुझ सी गई है...
चांदनी सी थी वो बुझ सी गई है...
कहाँ जायेंगे ये अम्बर के तारे....
सुख के किनारे गम के ये धारे...
रास्तो में बिखरे हैं मंजिलों के निशाँ....
बुत बन गए हैं जो थे कभी कारवां...
दिखाई न देते जिंदगी से हारे...
सुख के किनारे गम के ये धारे...
अपनों के तिनके बिखरने लगे हैं...
एक एक कर सब राह बदलने लगे हैं...
अपनी तन्हाई से इलने लगे हैं ये सारे ...
सुख के किनारे दुःख के ये धारे...
सुख के किनारे, दुःख के ये धारे...
चली जा रही नदिया किसके सहारे ...
...भावार्थ
एहसासों के कारवां कुछ अल्फाजो पे सिमेटने चला हूँ। हर दर्द, हर खुशी, हर खाब को कुछ हर्फ़ में बदलने चला हूँ। न जाने कौन सी हसरत है इस मुन्तजिर भावार्थ को।अनकहे अनगिनत अरमानो को अपनी कलम से लिखने चला हूँ.....
Monday, September 7, 2009
Wednesday, September 2, 2009
धुआं नहीं उठा !!!
कई दिन गए, हफ्ते गए...
रातें गई शामे गई...
मगर ये धुआं नहीं उठा...
ऐसा नहीं है की आग बुझ गई है...
ऐसा भी नहीं है की ख्याल की आंच नहीं है...
जेहेन में बेचैन सवालों का सेलाब नहीं है...
ये जो अल्फाजो के उपले जो गीले से थे ...
थोड़ा वक्त ले रहे थे सुलगने में..
मैंने उनमें एहसास का तेल छिड़क दिया है...
अब देखना कैसे धधकते हैं ये ...
और कैसे उठता है धुआं...
मेरे दिल के कौने से कोई नज़्म बन कर...
भावर्थ
रातें गई शामे गई...
मगर ये धुआं नहीं उठा...
ऐसा नहीं है की आग बुझ गई है...
ऐसा भी नहीं है की ख्याल की आंच नहीं है...
जेहेन में बेचैन सवालों का सेलाब नहीं है...
ये जो अल्फाजो के उपले जो गीले से थे ...
थोड़ा वक्त ले रहे थे सुलगने में..
मैंने उनमें एहसास का तेल छिड़क दिया है...
अब देखना कैसे धधकते हैं ये ...
और कैसे उठता है धुआं...
मेरे दिल के कौने से कोई नज़्म बन कर...
भावर्थ
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