Monday, February 2, 2009

बशीर बद्र

दरिया से इक्तिलाफ का अंजाम सोच लो।
नदिया के साथ साथ बहो तुम नशे में हो।

क्या दोस्तों ने रात भर पिलाई है तुमको।
अब दुश्मनों के साथ रहो तुम नशे में हो।

बेहद शरीफ लोगो से कुछ फासला रखो।
पी लो मगर कभी न कहो की तुम नशे में हो।

कागज़ का यह लिबास चिरागों के सेहर में।
संभल के संभल चलो जाना तुम नसे में हो।

मासूम तितलियों को मसलने का शौक है।
तुम तौबा करो खुदा से डरो तुम नशे में हो।

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इबादतों की तरह में यह काम करता हूँ।
मेरा उसूल है पहले में सलाम करता हूँ।

मुखालफत से मेरी शख्शियत सवरती है।
में दुस्मानो का बड़ा एहतराम करता हूँ।

में डर गया हूँ इन सायादार पेडो से।
जरा सी धुप बीचा कर कयाम करता हूँ।

मुझे खुदा ने गज्हल का दयार बख्सा है।
यह दौलत में मोहब्बत के नाम करता हूँ।

बशीर बद्र...

Sunday, February 1, 2009

कुछ शेर !!! अहमद फ़राज़ ...

इससे पहले की बेवफा हो जाएँ...
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जायें...
तू भी हीरे से बन गया पत्थर...
हम भी कल क्या से क्या हो जाएँ...

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है...
की फूल अपने कबायें क़तर के देखते हैं...
रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ करती हैं...
चले तो उसको जमाने ठहर के देखते हैं...

अहमद फ़राज़...