Thursday, December 6, 2012

जिस्म की खायिश लिए जिस्म फिरते हैं

जिस्म की खायिश लिए जिस्म फिरते हैं
इक बदहवासी सी लिए होश फिरते हैं

ताल्लुकात जो न दुनिया को दिखाई दिए
अंगारे ऐसे ही लिए राख के गुबार फिरते हैं

सुहाग का सिदूर लाली कब की खो चूका
लत-ओ-नशा लिए यहाँ जिस्म फिरते हैं

तब्दील हम न हुए ये जमाना हुआ भाव
आरजू मौत की इश्क में हम लिए फिरते हैं

जिस्म की खायिश लिए जिस्म फिरते हैं
इक बदहवासी सी लिए होश फिरते हैं



भावार्थ









Tuesday, August 28, 2012

ये न पूछो उम्र कितनी है

ये न पूछो उम्र कितनी है
इस माटी के खिलोने की
गर पूछो तो चमक कितनी
इस भीतर बसे सोने की

बढ़ाना भी है तो तजुर्बा बढाओ
साल दर साल जश्न का मतलब क्या है
जिंदगी काम किसी के आ सके तो अच्छा ...
वरना झूठे लोगों में कहकहों का मतलब क्या है

अजीब राहगीर है हम भी दुनिया में
न राह का पता न मंजिल की खबर
मुद्दतों से जिससे है तड़पते रहे
उसी में अब भी डूबे आते हैं नज़र

एक और घडा भरेगा फूट जायेगा
न रहेगा घट का और पानी का निशाँ
जिन्दा था तू भी कभी इसी मिटटी पे
कुछ तो कर रह जाए उस करनी की निशा

भावार्थ