Saturday, October 29, 2016

शुभ दीपावली २०१६

चकाचौंध हुए सब शहर
पर भीतर काजल कोठरी
फूंके लक्ष्मी सरे राह पे
खाली भूखों की टोकरी

व्योम पुटाश से है भरा
हवा में बस गयी गंध
आज पाखी जो भी उड़ा
कुछ बधिर हुए कुछ अंध

है राम लौटने की ख़ुशी
तू दे रावण को सिधार
काम क्रोध जो हैं बसे
तू उनको जला के मार

दीप जला स्नेह का
दे सेवा से तू सजाय
ध्यान लगा तू इष्ट पे
अर दिवाली ले मनाय

भावार्थ
३०/१०/२०१६
शुभ दीपावली २०१६ 

Saturday, September 10, 2016

लफ़्ज़ों से अब मुलाक़ात नहीं होती !!!

लफ़्ज़ों से अब मुलाक़ात नहीं होती

बिछड़ गए है हम तो सुखन से
गज़ल से अब बात नहीं होती
शोर से भरी है शहर की गलियां  
लफ़्ज़ों से अब मुलाक़ात नहीं होती

बिछड़ गए है हम तो सुखन से
लफ़्ज़ों से अब मुलाक़ात नहीं होती

अब कोई दोहा हमें राह बतलाये नहीं
क्या है तहज़ीब हमें ये समझाए नहीं
चले आये हैं गावँ को छोड़कर जो 
बुजर्गों की सलाह अब साथ नहीं होती

बिछड़ गए है हम तो सुखन से
लफ़्ज़ों से अब मुलाक़ात नहीं होती

इश्क़ अब जिस्म पे है सिमटा चुका
वो जूनून-ए -मोहब्बत भी  मिट चूका
खोखले रिश्ते को ढोती है जिंदगी
वो अंदाज़ हया श्रृंगार की बात नहीं होती

बिछड़ गए है हम तो सुखन से
लफ़्ज़ों से अब मुलाक़ात नहीं होती

अब कोई फ़कीर गुनगुनाये नहीं
पाक रूह अब नज़र आये नहीं
बहरूपिये अब  बन बैठे हैं खुदा
बैचैन हैं दिन सुकून की रात नहीं होती

बिछड़ गए है हम तो सुखन से
लफ़्ज़ों से अब मुलाक़ात नहीं होती

भावार्थ
११/०९/२०१६ 

Wednesday, September 7, 2016

बेपनाह मोहब्बत किये जा रहे हैं

बेपनाह मोहब्बत किये जा रहे हैं
हम तेरी जुस्तजू में जिए जा रहे हैं

तल्खियां जिगर की आँखों में है भरीं 
मुस्करा कर इन्हें हम छुपाये जा रहे हैं

बेपनाह मोहब्बत किये जा रहे हैं

हमको मालूम है हमसफ़र है बेवफा
साथ फिर भी हम निभाए जा रहे हैं

बेपनाह मोहब्बत किये जा रहे हैं

चराग ये बुझा गयी वक़्त की आँधियाँ
न जाने कहाँ है अब किधर जा रहे हैं

बेपनाह मोहब्बत किये जा रहे हैं

लौट आयगा वो जो हो मेरा नसीब
बस यही सोच कर हम जिए जा रहे हैं

बेपनाह मोहब्बत किये जा रहे हैं
हम तेरी जुस्तजू में जिए जा रहे हैं

भावर्थ
७/९/२०१६ 













Thursday, August 25, 2016

सफर-ए - जिंदगानी

तू दिल के रास्ते तो चल
बड़ी मंजिले हैं पानी
डूबकर निकलना ही तो
है सफर-ए - जिंदगानी

भावार्थ
२५/०८/२०१६








Wednesday, August 17, 2016

तेरे लिए .... जिंदगी

तेरे लिए तेरे लिए 
तेरे लिए .... जिंदगी

साँसों में तू हर शय में तू 
तुझसे है मेरा वजूद 
हर शाम में हर एक नाम में 
बस एक तू है मौजूद  

तेरे लिए तेरे लिए
तेरे लिए .... जिंदगी 

तेरी तड़प है रात दिन 
तेरा ही है आसरा 
तेरे बिना न दूजा कोईं 
करदे नज़र तू ज़रा  

तेरे लिए तेरे लिए
तेरे लिए .... जिंदगी 

न कोई चाह है न कोई खाब है 
बस तेरी ही है आरजू 
मुझको तू कर खुद में फनाह 
मैं हो जाऊं बस तू ही तू 

तेरे लिए तेरे लिए
तेरे लिए .... जिंदगी

भावार्थ 
१६/०८/२०१६ 




Monday, August 8, 2016

बदहवासी

बदहवासी में भी होश रखा मैंने...
ये क्या कुछ कम है तुझे देखने के बाद...

भावार्थ 

Friday, June 24, 2016

ये जब्र भी देखा है तारीख की नज़रों ने

ये जब्र भी देखा है तारीख की नज़रों ने
लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई 

शिव कुमार "बटालवी"

थम थम जा वफ़ा की डगर

थम थम जा वफ़ा की डगर 
जो मंजिल इश्क़ में  पानी है 
रूह तेरी ये मेरी हो जाए 
मोहब्बत की  ये निशानी है 

थम थम जा वफ़ा की डगर 
जो मंजिल मोहब्बत की पानी है 

दो पल का ये अफसाना 
कुछ लम्हों की ये कहानी है 
जुड़ने बिछुड़ने का आलम 
इतनी ही तो जिंदगानी है 

थम थम जा वफ़ा की डगर 
जो मंजिल मोहब्बत की पानी है 

भावार्थ 
२६/०६/२०१६ 


झुकी नज़रों से यूँ तो मेरी हया बयाँ होती है

झुकी नज़रों से यूँ तो मेरी हया बयाँ होती है 
वो उठें तो कुछ पानेे की चाह बेइन्तेआह् होती है

यु तो मेरे वजूद की कई हिस्से मौजूद हैं इर्द गिर्द 
मगर हस्ती मेरी फिर भी गुमशुदा सरेराह होती है 

दर्द के तिनको से सजा है मेरा मखमली एहसास 
आंसू से रात और आह से हर एक सुबह होती है 

सोचती हूँ मुझे मेरे अक्स से कब रिहाई मिलेगी 
खुले आसमान में भी मेरी कैद बेपनाह होती है 


भावार्थ
२५/०६/२०१६ 



Saturday, June 11, 2016

कोई ढूढ़ता है मेरे होने का निशाँ ...

कोई ढूढ़ता है मेरे होने का निशाँ
कोई ढूढ़ता है मेरे होने का  जहाँ
उसमें  है मुझसा  ही अक्स
मुझमें रहता है वही शख्श

कोई ढूढ़ता है मेरे होने का निशाँ ...

मिटटी में है जो जान वो मैं हूँ
दुनिया में है जो इंसान वो मैं  हूँ
कायनात में है बस मेरा ही रक्स
मुझमें में रहता है वही शख्श

कोई ढूढ़ता है मेरे होने का निशाँ ...

तीरगी के अँधेरे में नूर वो मैं हूँ
मोहब्बत में है सुरूर वो में हूँ
हर एक  में है मेरा ही नक्स
मुझमें रहता है वही शख्श

कोई ढूढ़ता है मेरे होने का निशाँ ...
कोई ढूढ़ता है मेरे होने का  जहाँ

भावार्थ
११/०६/२०१६






Wednesday, June 8, 2016

जेहन नहीं दिल बोलता है आदमी सच्चा ही होगा

हर तरफ दुश्मन है उसके आदमी अच्छा ही होगा
जेहन  नहीं  दिल बोलता है आदमी सच्चा ही होगा
भावार्थ  !!!

Tuesday, May 24, 2016

छुट्टियाँ

आज कल की छुट्टियाँ भी क्या अजीब हैं
जब भी लौटा हूँ इनसे थक कर लौटा हूँ
भावार्थ
२४/०५/२०१६

Thursday, May 19, 2016

नीर है ये पीर

निवाले को जो तरसते रहे
आज बूँद भर को प्यासे हैं
तू करम करेगा एक दिन
लगता है की बस दिलासे हैं

क्यूँ हुआ है बेरहम तू मौला
कर दे बन्दों पे रहम तू मौला

प्यास की तड़प तो देखो
लब सूख कर चरमराने लगे
बोझिल हो रही है नजरें
कंठ फूट कर लड़खड़ाने लगे

क्यूँ हुआ है बेरहम तू मौला  
कर दे बन्दों पे रहम तू मौला

पानी देखो दर्द बन बैठा
प्यास बन गयी है बीमारी
गाढ़ा हो गया खून सबका
कंठ ने है फिर चीख मारी

क्यूँ हुआ है बेरहम तू मौला  
कर दे बन्दों पे रहम तू मौला

दरिया को जमीं निगल गयी
फट पड़ा जमीं का सीना
बाँझ  हो गए सब बादल
बड़ा मुश्किल हुआ है जीना 

क्यूँ हुआ है बेरहम तू मौला  
कर दे बन्दों पे रहम तू मौला


कुएं कुंडली मार गए
नहर का नहीं है निशिान
तालाब वीराने हो गए
सब खेत हुए हैं शमशान

क्यूँ हुआ है बेरहम तू मौला  
कर दे बन्दों पे रहम तू मौला

भावार्थ 
१९/०५/२०१६ 


हर लफ्ज़ तेरा एक दरिया है

हर लफ्ज़ तेरा एक दरिया है
हर शेर तेरा एक समंदर है
एक दुनिया है तेरी ग़ज़लें
जाने क्या क्या उसके अंदर है

भावार्थ

ग़ालिब की ग़ज़लों के बारे में... 

मिर्ज़ा असद ग़ालिब !!!


Saturday, May 14, 2016

बहुत दूर तलक है आ चुका तू अब लौट चल

बहुत दूर तलक है आ चुका तू अब लौट चल
वजूद ख़ाक में है मिटा चुका तू अब लौट चल

छोड़ दे तू उन बेपरवाह खाईशों  का दामन
तोड़ से ये अरमान के खोखले आशियाने
सराब-ए- सफर था ये तेरा तू अब लौट चल
बहुत दूर तलक है आ चुका तू अब लौट चल

बहुत दूर तलक है आ चुका तू अब लौट चल
वजूद ख़ाक में है मिटा चुका तू अब लौट चल

अजनबी चेहरों में कभी हमराज़ नहीं मिलते
अंजान शहरों में  यूँ ही आशियाने नहीं मिलते
नहीं मिलेगा हमनवाँ कोई तू अब लौट चल
बहुत दूर तलक है आ चुका तू अब लौट चल

बहुत दूर तलक है आ चुका तू अब लौट चल
वजूद ख़ाक में है मिटा चुका तू अब लौट चल

जूनू सफर का तेरा अब जर्द हो चुका शायद 
मजा परवाज़ का अब  दर्द हो चुका शायद
हो गयी सहर जिंदगी की तू अब लौट चल
बहुत दूर तलक है आ चुका तू अब लौट चल

बहुत दूर तलक है आ चुका तू अब लौट चल
वजूद ख़ाक में है मिटा चुका तू अब लौट चल

भावार्थ
१४/०५/२०१६







Saturday, May 7, 2016

वो मेरी माँ थी

वो मेरी माँ थी

मेरी भूख की मंजिल
सब अनजाने चेहरों में अपनी
इक  कठपुतली सी थिरकती
वो मेरी माँ थी

मेरी दर्द को सहती
मुझसे मेरी जुबाँ में कहती
मेरी हर आवाज़ पे तड़पती
वो मेरी माँ  थी

मेरे टूटे बोलों को बनाती
मेरी बातों पे गौर फरमाती
मेरी नासमझी को समझती
वो मेरी माँ थी

मुझसे बिछुड़ कर देर तक रोये
मेरी याद में न नींद भर सोये
आँखों  में आंसू सी झलकती
वो मेरी माँ थी

भावार्थ

08/05/2016
Happy mother's Day !!!




Tuesday, April 26, 2016

रखना शुमार तू मुझे अपनी दुआओं में !!!

रखना शुमार तू मुझे अपनी दुआओं में
भुला न देना कहीं जाके मायावी बाहों में

पतझड़ से पहले ही ये दरख़्त सूख जाएँ
नहीं इतना  भी हौंसला  इन फ़िज़ाओं में

उफक के पार ले जाने का हुनर है जिसमें
ख़ाक में मिटा दे कुछ ऐसी बात हवाओं में 

बात कुछ भी नहीं इन हुस्न की मंजिल में
कशिश की हद तो  है मोहब्बत की राहों में

खुदा के घर में रहा तू पाक तो क्या सबब
जो गिर चुका है तू अपनी  ही निगाहों में

रखना शुमार तू मुझे अपनी दुआओं में
भुला न देना कहीं जाके मायावी बाहों में

भावार्थ
२६/०४/२०१६













Monday, March 28, 2016

"मैं" कैद में हूँ "खुद" के पिंजरे में

"मैं" कैद में हूँ "खुद" के पिंजरे में 
जूनून है आज़ादी का मगर हौंसला ज़रा कम है 

"मैं" कैद में हूँ "खुद" के पिंजरे में 
पिंजरे में युँ तो ऐश-ओ-आराम है सब के सब 
मगर नहीं है तो बस आज़ादी का सुकून 
इसकी हर एक ईंट कितने उन्माद से रखी मैंने 
सोच कर कि दर्द से निजात मिले शायद 
मगर ये हो न सका , दर्द मेरा मिट न सका 

"मैं" कैद में हूँ "खुद" के पिंजरे में 
लोग कहते हैं क्यों तुम बाहर नहीं आ जाते 
क्यूँ  गुमनाम से बने रहने में खुश हो तुम 
क्यों आज़ादी की परवाज़ नहीं भरते
बस  जरा सा होंसला क्यूँ नहीं करते तुम 
"मैं" कैद में हूँ "खुद" के पिंजरे में 

"मैं" कैद में हूँ "खुद" के पिंजरे में 
जिंदगी को एक हसीं आगाज़ समझ बैठा 
इस पिंजरे को शायद "खुद" मान लिया मैंने  
और मौत को मनहूस अंजाम समझ बैठा 
"मैं" "खुदा" से दूर हूँ "खुद" की सलाखों में 

"मैं" कैद में हूँ "खुद" के पिंजरे में 

भावार्थ 
२८/०३/२०१६ 





Friday, March 11, 2016

सफर में धुप तो होगी जो चल सको तो चलो !!!

सफर में धुप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम निकला कसको तो चलो

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो

किसी के लिए वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो

यही है जिंदगी कुछ खाब और चंद  उमीदें
इन्ही खिलोनो से तुम भी बहाल सको तो चलो

सफर में धुप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम निकला कसको तो चलो

निदा फ़ाज़ली 




Tuesday, January 26, 2016

ये इनायतें गज़ब की, ये बला की मेहरबानी

ये इनायतें गज़ब की, ये बला की मेहरबानी
मेरी खैरियत भी पूछी, किसी और की ज़बानी

मेरा ग़म रुला चुका है तुझे बिखरी ज़ुल्फ वाले
ये घटा बता रही है, कि बरस चुका है पानी

तेरा हुस्न सो रहा था, मेरी छेड़ ने जगाया
वो निगाह मैने डाली कि संवर गयी जवानी

मेरी बेज़ुबान आंखों से गिरे हैं चन्द कतरे
वो समझ सके तो आंसू, न समझ सके तो पानी

नज़ीर बनारसी

Monday, January 25, 2016

ग़रज़ बरस प्यासी धरती पे फिर पानी दे मौला

ग़रज़ बरस प्यासी धरती पे फिर पानी दे मौला 
चिड़ियों को दाने  बच्चों  को गुडधानी दे मौला 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

चिड़ियों को दाने  बच्चों  को गुडधानी दे मौला 

फिर रोशन कर जहर का प्याला चमका नयी सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला

चिड़ियों को दाने  बच्चों  को गुडधानी दे मौला 

फिर मूरत से बाहर आ कर चारों ओर  बिखर जा
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

चिड़ियों को दाने  बच्चों  को गुडधानी दे मौला 

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला

ग़रज़ बरस प्यासी धरती पे फिर पानी दे मौला 
चिड़ियों को दाने  बच्चों  को गुडधानी दे मौला 

निदा फ़ाज़ली !!!

ताबानी: Light
सलीबें : Cross





Sunday, January 24, 2016

निदा फ़ाज़ली !!!

खुसरो रैन सुहाग की सो जागी पिय के संग
तन मोरा मन पिहू का सो दोनों एक ही रंग

अमीर खुसरो

माँ खुदा का मोजजा हरदम रहे जवान
जब बूढी होने लगे बन जाए संतान

स्टेशन पर  ख़त्म की  भारत तेरी खोज
नेहरू ने लिखा नहीं कुली के सर का बोझ

जिस पंछी के वास्ते पेड़ बने भगवान
पिंजरे में रख के उसे  प्यार करे इंसान

निदा फ़ाज़ली !!!





Saturday, January 2, 2016

जीन मरण के चाक से छूटे क्या कर जाएँ जीवन में


दरिया से निकलने की कोशिश जारी है

दरिया से निकलने की कोशिश जारी है
जीना मुहाल है और मौत में बेकरारी है

मन का बहलाना  तो बड़ा ही आसान था 
मन का लगाना ही तो बड़ी दुशवारी   है

भावार्थ
०२/०१/२०१६








Friday, January 1, 2016

बीत गए दिन भजन बिना रे

बीत गए दिन भजन बिना रे
भजन बिना रे भजन बिना रे

बाल अवस्था खेल गवाओ
आई जवानी तब मान धुना रे

लाहे कारण मूल गवाओ
अबहू न गयी मन की तृष्णा रे

संत कबीर 





पानी बिच मीन प्यासी रे

पानी बिच मीन प्यासी रे
मोय सुन सुन आवे हासी रे

घर में वस्तु नज़र न आवत
बन बन फिरत उदासी रे

आतम ज्ञान बिना जग झूठा
क्या मथुरा क्या काशी रे

संत कबीर