Saturday, April 28, 2012

दरिया-ए-सुखन में उबरा हूँ मैं...

जब जिंदगी-ए- सेहरा में डूबा तो ...
दरिया-ए-सुखन में उबरा हूँ मैं...
कुंस-ए-उल्फत  की चाह हुई तो...
तेरे आस्तां पे  ठहरा  हूँ मैं...

तेरी वफ़ा से आज गुफ्तगू करता रहा...
इकतरफा मेरा दिल अपनी कहता रहा...  
दुनिया के सितम उसकी आँखों बोली...
जर्द चेहरा आलम-ए-बेवफाई कहता रहा...

भुलाने का हुनर न होता तो मर जाता...
देखता रहता आफताब को तो मर जाता...
जहर ही मर्ज की दवा है इश्क में भावार्थ...
लबो पे रख  भी लेता  दवा तो  मर जाता...

जिंदगी के बाद इक और जिंदगी जीनी है...
उसके दिल में...
उसकी यादो में...
उसके तसव्वुर में...
उसके खाबो में...
उसके आईने में...
उसकी यादो में...
जिंदगी के बाद एक और जिंदगी जीनी है...


भावार्थ...

1 comment:

संजय भास्‍कर said...

प्रशंसनीय रचना - बधाई
नई पोस्ट सदा की अर्पिता पर आपका स्वगत है