Tuesday, November 11, 2008

हिज्र बेइन्तेआह !!!

लिखते लिखते आज मेरी कलम रोने लगी...
न जाने कितनी दर्द भरी उसकी कहानी थी...
कहते कहते दिल से आह बहने सी लगी...
न मिटने वाली वो हिज्र की कोई निशानी थी...

आँसू ख़ुद को रोक न पाये थमी साँस के साथ...
दिल का दरिया बह निकला तेरी याद के साथ...
तन्हाई की परछाई कहाँ मुझसे अनजानी थी...
न मिटने वाली वो हिज्र की ऐसी निशानी थी...

रात रुक रुक कर मेरी सिसकियाँ सुना करती थी ...
हवा बह बह कर गम की दुनिया बुना करती थी...
सावन की सेहरा सी जलती ये दास्ताँ पुरानी थी...
न मिटने वाली वो हिज्र की ऐसी निशानी थी...

बेरंग सा हर रंग मुझे
कुछ अब लगने लगा है...
बुझा सा हर नूर मुझे क्यों अब दिखने लगा है...
रूह बिन हर जिस्म जैसे मूरत कोई बेमानी थी ...
न मिटने वाली वो हिज्र की ऐसी निशानी थी...

भावार्थ...

2 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया रचना है।बधाई स्वीकारें।

No Mad Explorer.... said...

Thanks Paramjeet ji !!!