Saturday, November 1, 2008


सुरमई रात है सितारें हैं
आज दोनों जहाँ हमारे हैं

सुबह का इंतज़ार कौन करे ?

फिर ये रुत ये समां मिले न मिले
आरजू का चमन खिले न खिले

वक्त का ऐतबार कौन करे?

ले भी लो हम को अपनी बाँहों में,
रूह बेचैन है निगाहों में

इल्तजा बार बार कौन करे?

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