Sunday, October 12, 2008

कैफियत-६

जब भी चूम लेता हूँ इन हँसी आँखों को।
दिल में सौ चिराग झिलमिलाने लगते हैं।

फूल क्या सफूगे क्या चाँद क्या सितारे क्या।
सब रकीब कदमो पे सर झुकने लगते हैं।

रक्स करने लगती हैं मूरतें अजंता की।
मुद्दतो की लब-बसता गान गाने लगते हैं।

फूल खिलने लगते हैं उजडे उजडे गुलशन में।
प्यासी प्यासी धरती पे अम्ल चने लगते हैं।

लम्हों भर को ये दुनिया जुल्म छोड़ देती है।
लम्हों भर को सब पत्थर मुस्कुराने लगते हैं।

जब भी चूम लेता हूँ इन हसी आँखों को।
सौ चिराग अंधेरे में झिलमिलाने लगते हैं।

कैफी आज़मी...

2 comments:

Raviratlami said...

अच्छी रचना है.

No Mad Explorer.... said...

Thanks a lot...