Friday, September 26, 2008

सोच की स्याही !!!

कब से मेरी कोई भी ग़ज़ल खिलखिलाई न थी।
सोच की स्याही हर्फ़ बनके यू मुस्कुरायी न थी।

चन्द ख्वाब भी आए भी तो तैरते फलक बनकर।
उनमें से वो अरमानो की घटा बरस पायी न थी।

मेरे हर एक रिश्ते का तोहफा तो बस हिज्र था।
किसीको अपनाने की तमन्ना मचल पायी न थी।

जो तुम आए तो लगा जिंदगी मेहरबान हो गई ।
उस रोज मौत अपनी आंधी को रोक पायी न थी।

भावार्थ...

2 comments:

Anwar Qureshi said...

मेरे हर एक रिश्ते का तोहफा तो बस हिज्र था।
किसीको अपनाने की तमन्ना मचल पायी न थी।

जो तुम आए तो लगा जिंदगी मेहरबान हो गई ।
उस रोज मौत अपनी आंधी को रोक पायी न थी।
bahut khub likha hai ...

No Mad Explorer.... said...

thnx anwar...